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लघुकथा उत्सव 2025, साहित्यिक समृद्धि में योगदान

साहित्य का लक्ष्य आनंद प्रदान करना  है और आनंद ब्रह्म है :   डॉ अनिल सुलभ       

पश्चिम बंग हिंदी अकादमी  सूचना एवं संस्कृति  विभाग,  बंगाल  सरकार द्वारा तृतीय  ‘राष्ट्रीय लघु कथा उत्सव  2025 ‘   ‘बांग्ला  अकादमी सभागार’  में आयोजित किया गया। 
दो  दिवसीय  ‘ लघु कथा उत्सव’  में देश के  विविध प्रांतों से  आये हुए  अनेक जाने -माने साहित्यकारों  ने   लघुकथाओं पर विस्तृत चर्चा की एवं अपनी क्षेत्रीय कथाओं से श्रोताओं  के ज्ञान – कोष को समृद्ध किया। उपस्थित विशिष्ट वक्ताओं ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा – 

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि   डॉ अनिल सुलभ , अध्यक्ष : बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन  पटना ( बिहार ) : 

राष्ट्रिय लघुकथा उत्सव , पुस्तकों का लोकर्पण या काव्यपाठ आदि द्वारा जिस तरह से हिंदी पर गैर हिंदी प्रदेशों में काम हो रहा है वो बहुत जल्दी उन लोगों की भ्रांतियां दूर कर देगा जिन्हे लगता है की अहिन्दी प्रदेशों में हिंदी की उपेक्षा हो रही है। साहित्य, मार्ग दर्शन करता है, समाज में व्याप्त बुराइयों को व्यंग्य  या कथा के जरिये उजागर करता है। साहित्य का लक्ष्य आनंद प्रदान करना  है और आनंद ही ब्रह्म है.

डॉ सोमा बंदोपाध्याय , उपकुलपति , बाबा साहेब  अंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी , कोलकाता : 

लघुकथा की संक्षिप्ता  ही इसकी विशेषता है,  इसका अंत हमेशा एक सन्देश के साथ होता है।  लघुकथा;  एक छोटा सा सूत्र है , जिसके जरिये पाठकों के अंतर तक पहुंच कर उन्हें झिंझोरा जाता है ।  ठीक वैसे ही जिस प्रकार बिहारी जी ने अपने दोहे में कहा है-    ” सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर।  देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर।

गोकुल सोनी : 

जिन लोगो के अंदर साहित्य साधना की भावना है , उन्हें समझना होगा कि ये ईश्वर द्वारा  दिया गया दायित्व  है, जिसका निर्वहन बिना अहंकार के ,  विनम्रता के साथ  आप  सभी  साहित्यकारों को करना है। यही नहीं वरिष्ठ कथाकार गोकुल सोनी ने हिंदी की तुलना नदियों के उद्गम से करते हुए कहा  कि  “आरम्भ में पतली धार , फिर एक छोटा तालाब  और तत्पश्चात विस्तार। ” उन्होंने ये भी कहा कि लोक भाषाएँ हिंदी की जनक है तथा समाज की सजग प्रहरी है।  

डॉ शुभ्रा उपाध्याय , सहयोगी प्रवक्ता खुदीराम बोस कालेज , कोलकाता : 

 समीक्षात्मक टिपण्णी  देते हुए कहा  कि तथ्य संगत कथ्यों के सहारे कथा को उभार देना ही लघुकथा है।  लघुकथा का अलग मिजाज एवं तंज होता  है।  लघुकथाएं  कम से कम शब्दों में प्रभावशाली संरचना है  जिसका असर काफी देर तक रहता है। उन्होंने कथाकार और उसकी कथाओं की तुलना कवि रामधारी सिंह  दिनकर की पंक्तियों के साथ की : ” दिनकर वह संसार जहां तक किरण अभी तक नहीं पहुंची। “

डॉ. सुखचंद सोरेन, प्राध्यापक,  संथाली भाषा;     रविंद्र भारती  यूनिवर्सिटी  कोलकाता : 

ने अपने वक्तव्य में कहा कि  ” संथाली भाषा  की लघुकथाओं  में हमेशा अन्याय , अत्याचार  के खिलाफ लड़ना -आंदोलन करना  ही मुख्य विषय होता है ।”   संथालियों का मानना है कि  आंदोलन किये बगैर तो कुछ  मिलेगा नहीं। ।

   वीं अरुणा : 

   दक्षिण भारत की  कहानियों के ऊपर चर्चा   करते हुए कहा  कि  तेलुगु में कहानी को कथलु बोला  जाता है।  वहां के लोग कथा को सिर्फ मनोरंजन  के लिए ही नहीं लिखते  अपितु समाज  में व्याप्त  विसंगतियों – कुरीतियों  पर केंद्रित करते है। 

डॉ सौम्यजीत आचार्य,   अनुवादक,  कथाकार एवं लेखक  :

‘लघुकथाओं का महा विश्व ‘ जैसी  चर्चित पुस्तक के लेखक डॉ सौम्यजीत आचार्य  ने अपने वक्तव्य में कहाँ कि  ” जीवन बाहर  जाने का नाम  नहीं है अपितु अपने शरीर के अंदर की यात्रा करने का नाम  है। 

   असित बरन बेरा :   

  बंगाली लघुकथाओं पर चर्चा करते हुए ‘ बनफूल ‘ ( १०० कथाएं समाहित ) और  चमत्कृत (रूपक व्यंग्य )  का  जिक्र किया  तत्पश्चात स्वरचित लघुकथा का पाठ किया। 
 
 द्वितीय सत्र   लघुकथा का दौर था जिसमे  लघुकथाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया,   शामिल थे – सर्वश्री गोकुल सोनी‌, विद्या भण्डारी , सूर्या सिन्हा, शकुन त्रिवेदी, रंजना झा, प्रणति ठाकुर, सुरेश शॉ, डॉ पूनम आनंद, विजय शंकर विकुज, रावेल पुष्प तथा रचना सरन।    डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी जी ने निष्पक्ष समीक्षा कर सबको प्रभावित किया।
 
 इस अवसर पर वरिष्ठ रचनाकार विद्या भण्डारी जी के नवीनतम लघुकथा संग्रह ” सीप में मोती” तथा विशिष्ट लघुकथाकार अशोक भाटिया के दो लघुकथा संग्रहों तथा गोकुल सोनी के एक लघु कथा संग्रह की बांग्ला में अनुवादित पुस्तकों को भी लोकार्पित किया गया।  41 भाषाओँ की अनुवादक  बेबी कारफ़रमा  की पुस्तक का भी लोकार्पण हुआ।  

लघु कथा उत्सव के दूसरे दिन  लिटिल थेस्पियन के कलाकारों द्वारा लघुकथाकारों की कुछ लघुकथाओं का अभिनयात्मक पाठ कर दर्शकों के दिल पर कथा और कथाकार की अमिट  छाप छोड़ दी .   डॉ. अनिल सुलभ ने विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की।
 
लघुकथा की सफलता का श्रेय संयोजक रवेल पुष्प जी को जाता है जिन्होंने दो पंक्तियों द्वारा  कार्यकम के पीछे की  मेहनत  को उजागर  करते हुए सुनाया –

” कामयाबी के इस सफर में धूप बड़ी काम आयी 

   छाँव अगर होती तो शायद हम सो गए होते ” 

कार्यक्रम का कुशलता पूर्वक संचालन लघु कथाकार  रचना सरन ने किया।    

हिन्दी अकादमी के सदस्य सचिव श्री गिरिधारी साहा ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। 

  • – शकुन  त्रिवेदी

shakuntrivedi@gmail.com

 

 

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