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“जीवन के रंग दोहों के संग”

जीवन के रंग दोहों के संग 

 

बबीता मंढाणा

मूल्य : र 325

प्रकाशक : लोकमित्र ; 1/6588, पूर्वी रोहतास नगर ,शाहदरा, दिल्ली -110032 

 011 -22328142 9910343376

समीक्षक शकुन त्रिवेदी

“वर्ण इकाई शब्द की ,भाषा का आधार।
      शुद्ध सीख कर पाइये ,श्रेष्ठ ज्ञान का सार।।”
श्रेष्ठ ज्ञान की बात करने वाली कवयित्री  बबीता मंढाणा ने  लुप्त होती छंद विद्या में दोहों की  रचना करके अपने ज्ञान का परिचय ही नहीं दिया है अपितु  उसका प्रचार – प्रसार करने का भी प्रयास किया है।  वो भी भिन्न- भिन्न  विषयों पर पूर्णरूपेण संवेदना के साथ।   ये   वही कर सकता है जिसके पास भावनाएं और ज्ञान हो।  ” जीवन के रंग दोहों के संग ” 226 पन्नों को समाहित किये  “जीवन के रंग दोहों के संग ”    दोहा  संग्रह अनेक विषयों पर केंद्रित है जैसे प्रारम्भ ही  “मंगलाचरण”  से  हुआ :
“स्नेह कृपा से कीजिये ,साधक का कल्याण 
दुःख  तिमिर का नाश हो ,मिले लोभ से  त्राण ।” 
 
भक्ति और अध्यात्म से अपनी लेखनी को मुखर करती लेखिका ‘ सनातन में श्रेष्ठ माने जाने वाले अधिकतर देवी -देवताओं के बारे में छंदबद्ध रचना लिखी है। 
कवयित्री बबीता;  कबीरदास से भी काफी प्रभावित दिखती है. उनसे प्रेरित होकर अपनी कलम चलाते हुए कहती है –
” कह कबीर जो भी गए जीवन दर्शन सार। 
  युग बीते पर दे रही ,संत नीति आधार।।”
 
आध्यात्म से निकल कर कवयित्री की कलम परिवार पर आकर चलती है।  जैसे कि –          
 
“भोजन करने संग में , मिल बैठे परिवार। 
खुल कर सब संवाद हो , प्रेमिल नैया पार।।”
परिवार में माता -पिता ,बेटी , शिशु सभी को समाहित किया है। 
कवयित्री बबीता मंढाणा ने जीवन के प्रत्येक पहलु को छंदबद्ध  के जरिये उकेरने की कोशिश की है जैसे : समय, तनाव ,लड़ाई , शंका सुख  , सच, निर्णय, आशा क्रोध आदि भावों पर । 
उनकी संवेदना शब्दों के साथ किस तरह से छंदों में पिरोयी गई है , उसका उदाहरण –
‘ काल खंड के पृष्ठ में’ ( कविता )  में दृष्टिगत है,
” आजादी का हो रहा आज गलत उपयोग। 
नवपीढ़ी को है लगा , भावहीनता रोग। “
“टूट रही अब देखिये , रिश्ते की हर डोर। 
युवा धुत हो बोलते यह मन मांगे शोर।। “
कवयित्री की कलम यहीं नहीं रुकी वरन प्रकृति के प्रत्येक पहलू पर भी चली है  क्योंकि कवयित्री  बबीता मंढाणा का मानना है कि -” जीवन की विविधता ही उसका असली सौंदर्य है.”    जैसे  – 
प्रकृति रंग की भूमि है , अद्भुत मोहक चित्र। 
 घानी  इसकी ओढ़नी , नील गगन है मित्र।।  
हवा नीर की बात क्या , जीवन की तस्वीर।
मानव सीखे नित्य ही,  हरना सबकी पीर।।   
चाँद सभी का लाडला , ताने रजत- वितान। 
दिव्य -किरण के तंतु से , तने दृष्टि कमान।।  
कवयित्री ने दोहा कैसे  लिखना है उसका भी ज्ञान शब्दकारों को दिया है जो इस दोहा संग्रह को अति उत्तम बनाते है –
दोहे लिखना धैर्य से , पूरे जान विधान। 
मात्रा -चरण तुकांत का रखना साधक -ज्ञान ।। 
चार चरण लिख  लीजिये ,  तेरह ग्यारह योग। 
मात्रा -गणना सीख के , मिटे दोष का रोग।। 
ये दोहा संग्रह,  सिर्फ पढ़ने के लिए ही नहीं लिखा गया है  वरन बहुत से दोहों को आत्मसात करने के लिए भी लिखा  है, या यूं कहे कि कुछ दोहे  स्वतः  ही अंतर में समा जाते  है और बार – बार जुबान पर आ जाते है।  सब कुल मिला कर एक अच्छा दोहा संग्रह, जिसे कवयित्री ने बड़े मनोयोग से लिखा है। उम्मीद है आने वाले दिनों में दोहा  संग्रह साहित्य संसार में अपनी अनूठी पहचान के लिए जाने जायेंगे। 
-शकुन त्रिवेदी  

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