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जीवन दर्शन की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है ‘ बूंद बूंद सागर’ : रावेल पुष्प, समीक्षक


मुझे याद आता 70 का वो दशक जब मैं कॉलेज का विद्यार्थी था,वो भी पियोर साइंस का पर साहित्य का नशा कुछ इस कदर हावी था कि उस समय की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिकाएं धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका,नवनीत,कादंबिनी और उससे पहले बच्चों की बाल भारती,नंदन,चंपक,तेज,लोटपोट से होकर गुजर रहा था। उसी दौर की पत्रिका कादंबिनी में खासतौर से प्रकाशित होती थीं क्षणिकाएं जिसे सबसे पहले पढ़ता था और अधिकतर ये एक कवियित्री सरोजिनी प्रीतम की होती थीं। उसके बाद कुछ पत्रिकाएं क्षणिकाओं को फिलर के रूप में उपयोग करती रही थीं।
अभी हाल ही में लोकार्पित क्षणिकाओं का एक संग्रह- बूंद बूंद सागर में मुझे डुबकी लगाने का मौका मिला।
इस संग्रह में पिछले एक दशक के अनुभव क्षणों को त्वरित सीमित शब्दों में रुपायित किया गया है और वो बन गई है एक-एक क्षणिका। ये क्षणिकाएं ही संग्रहित होकर बन जाती हैं सागर। उस सागर की गहराई में होती हैं कई तरह की मछलियां,जीव और बेशकीमती मोती। उसी तरह संग्रहित संग्रह बूंद बूंद सागर में मधुर तिक्त अनुभूतियों ने संवेदनाओं का स्पर्श पाकर रंग-बिरंगी मछलियों और बेशकीमती मोतियों की शक्ल अख़्तियार कर ली है।इन बेशकीमती मोतियों से कुछ मोती बतौर बानगी पेश कर रहा हूं –
अंधेरे के आगे उजाले बहुत हैं
ऐ मेरे हमदम संभल- संभल चल
न जाने कितना दौड़ना पड़े
सुबह की आस में
जिंदगी तो वफा करती है
पर बेवफाई तो खुद ही जफा करती है
आसमां कब झुकेगा
तूफ़ान न जाने कब रूकेगा
जिजिविषा जिंदा रख चल
न तू बदल ना जहां बदल
और फिर देखें किस तरह
मिल जाती है सारी कायनात
गगन को चूम लेने की तमन्ना लिए हौसलों के पंख से
उड़ रहा था
राह में एक हमसफर मिला
और मंजिल मिल गई
एक सपना जो बसा था
अपनी आंखों में
आज पूरा हुआ
तो लगा
सारी कायनात मिल गई!
इन क्षणिकाओं के रचयिता हैं -अन्तर्राष्ट्रीय संस्था रचनाकार के संस्थापक श्री सुरेश चौधरी ‘इंदु’ जी,जो एक समर्थ साहित्यकार हैं और अब तक उनकी लगभग पैंतीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने लगभग हर रोज एक भजन लिखकर 1000 भजनों का एक विश्व कीर्तिमान भी स्थापित किया है,जिसे इंटरनेशनल बुक आफ रिकार्ड्स द्वारा प्रकाशित और प्रमाणित किया गया।
इस संग्रह की भूमिका में श्रीमती विद्या भंडारी जी बड़ी साफ़गोई से लिखती हैं कि वैसे तो सुरेश चौधरी जी की भाषा क्लिष्ट होती है, लेकिन क्षणिकाओं की भाषा बड़े सरल शब्दों में है,जो सीधे दिल तक उतरती हैं।
डॉ उर्वशी श्रीवास्तव ने इस पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ये एक ऐसी कृति है जो भावनाओं,दर्शन और काव्य सौन्दर्य तीनों का संगम प्रस्तुत करती है।
सचमुच ये केवल क्षणिकाओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन दर्शन की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।
पेपर बैक में इस संग्रह को शुक्तिका प्रकाशन, कोलकाता ने प्रकाशित किया और इसका मूल्य है ₹300।
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