घर आंगन की खुशबू
घर आंगन की खुशबू फिर भी दुत्कारी
ऑफिस से घर , घर से बाहर ये भी जिम्मेदारी
भाग दौड़ के जीवन में भूली अपनी माहवारी
मेरा घर मेरा आंगन हर पल इस पर वारी।
कही छल रही खुद को खुद से आधुनिकता की मारी
तोड़ दिए सारे बंधन हुई स्वतंत्रता हावी
हुई स्वतंत्रता हावी खुद को समझे आसमान पर भारी
पुरुषों के संग – साथ चली जो हुई व्यसन की आदि।
सच्चाई से आंखे मूंदे ऐसी क्या लाचारी
तू ही दुर्गा , गार्गी, विद्योतमा तू ही है वो नारी
बाहु पाश में आने को तरसे देव – देवता और व्यभिचारी
तेरे संयम और विवेक से तप कर निकली दुनियां सारी ।।
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