*प्रथम बैसाख : नव वर्ष का गान


आया प्रथम बैसाख, नव वर्ष का उजियारा,
बंग-धरा पर फैला देखो, खुशियों का नज़ारा।
ढाक की थाप गूंजे, मन हो जाता चंचल,
हर आंगन में खिल उठता, ये उत्सव निर्मल।
रवीन्द्र संगीत के सुनो,गूंज उठे स्वर,
“एसो हे बईशाख” ने जगा दिया हर घर।
शांतिनिकेतन से लेकर, हर एक गली तक,
संस्कृति-सुरभि से भरा, हर फूल कली तक
नव वस्त्र पहन सजे, बच्चे, बूढ़े और जवान,
घर-घर में मुस्कान लिए, लगे आने मेहमान।
परिवारों के संग-संग उमंगें लेती अंगड़ाई,
मां के हाथों की रसोई ने, फिर खुशबू फैलायी।
रसगुल्ला, संदेश, पायेश की मीठी सौगात,
इलिश-माछ, लुचि-आलूर दम की सुवासित बात।
थाल सजे स्नेह से, हर कौर में प्यार भरा,
खाने में जैसे पूरे वर्ष का उत्सव धरा।
हालखाता की परंपरा, नए खातों का सम्मान,
व्यापारियों के चेहरों पर भी झलके नव अरमान।
मिलते गले सभी, भूलकर हर रंजिश-भेद,
बैसाख सिखाता हमें,प्रेम सबसे बड़ा वेद।
बांग्लादेश में निकलती मंगल शोभायात्रा
यूनेस्को ने कहा हेरिटेज,और जोड़ी मात्रा
आओ मिलकर गाएं, नव वर्ष का यह गान,
सुख-शांति से भर जाए, दुनिया का हर इंसान।
# रावेल पुष्प*
मो: 9434198898.
ईमेल: rawelpushp@gmail.com
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