उजालों के बदलते रंग का लोकार्पण

सफर कैसे भी करे संघर्ष निश्चित है – डॉ रजनी साव
बैंगलोर से आयी डाक्टर राजनी साव के काव्य संग्रह ” उजालों के बदलते रंग” का लोकार्पण सदीनामा के तत्वाधान में कोलकाता शहर के नामचीन लोगों की उपस्थिति में किया गया. इस कार्यक्रम के आरंभ में प्रसिद्ध चित्रकार सुलोचना सारस्वत के अकासमिक निधन पर श्रोताऔ द्वारा श्रद्धा सुमन अर्पित किये गए । तत्पश्चात काव्य संग्रह ‘उजालों के बदलते रंग’ पर चर्चा की गई।
पुस्तक पर चर्चा करते हुए विमलेश त्रिपाठी ने कहा युद्ध के समय , संवेदन हीनता के समय , रौशनी तो है किन्तु रौशनी दिखाई नही देती ऐसे में उजालों के बदलते रंग काव्य संग्रह का प्रकाशन प्रशंसनीय है।
*हृदय नारायण सिंह, ‘अभिज्ञात ‘
क्यों, क्या, और कैसे, ज्वलंत प्रश्न इस संग्रह की ताकत है।
प्रेम पर , जिंदगी पर कुछ सशक्त कविताएं है जिन्हे पाठक वर्ग पसंद करेगा।
सेराज खान बातिश : कविता का मूल भाव स्पष्ट होना चाहिए वैसे भी आज के परिदृश्य में देखा जाये तो जो कुछ नहीं कर रहा वो कविता लिख रहा है , कविता का इतना सरलीकरण हुआ है कि कोई भी कविता लिख सकता है। लेकिन रजनी साव की कविताएं साफ – सुथरी त्रुटि रहित है।
अज्येंद्र त्रिवेदी: रजनी की कुछ कविताएं जीवन से संबंधित है जो बहुत ही सलीके से लिखी गई है।
जिंदगी संभव है अगर जीना चाहे/ बेहिचक है जिंदगी जीने का साहस होना चाहिए/
जिंदगी बड़ी अजीब है / हम बयाबान में हैं और घर में बहार है जिंदगी।
गीता दुबे:
एक स्त्री जब रचना करती है तो उसकी भाषा कैसी है , सबसे पहले ये देखा जाता है! पितृ समाज की भाषा या स्कूल , कालेज , फिल्म , सीरियल की भाषा। यहाँ कवियत्री ने बड़ी सरल भाषा में कवितायेँ लिखी है
रजनी का संग्रह अनुभूतियों पर केंद्रित है जिसे उसने बड़ी सहजता एवं सरलता से कविताओं में उतारा है। उसकी कविताओं के कुछ उदाहरण – “कुत्ता इंसान को पहचान लेता है लेकिन इंसान , इंसान को नही पहचानता।” ” सफर कैसे भी करे संघर्ष निश्चित है, ” आदि। और सबसे अच्छी बात कवियत्री का ये कहना कि ” एक टोकरी हिम्मत होनी चाहिए। ” प्रशंसनीय है।
रजनी साव, (कवियत्री) प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कवि है , लिखने का समय भी सबके पास है ,न लिखने का कारण इच्छा शक्ति का अभाव। मेरी कवितायेँ
जिंदगी के ऊपर ज्यादा है मैंने कविताओं के माध्यम से जिंदगी के प्रत्येक रूप को उभारने की कोशिश की ।
उद्घटनकर्ता एवं प्रधान वक्ता विशंभर नेवर ने अपने वक्तव्य में कहां – जब तक ज्ञान तब तक उजाला , ज्ञान बिना सब व्यर्थ। कवि नीरज की पंक्तियां” मानव होना भाग्य कवि होना सौभाग्य” का उदाहरण देते हुए कहा कि युद्ध के दौरान कविताएं लिखना और प्रकाशन कराना बड़ी बात है। विचारों की प्रथम अभिव्यक्ति कविता है। कविता तभी समझी जा सकती है जब आपके पास दृष्टि या दृष्टिकोण हो।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्य पाठ
रचना सरन : मिल गई मंजिल मुझे अब उस दहर की ,
कर्ज रहबर का उतर जाये तो बेहतर।
शैलेंद्र शांत : मैं हूं तुम्हारी कविता, आओ मेरे पास बैठो
बृज मोहन सिंह :
हंसते खिलखिलाते बच्चे उकेर रहे है खिलखिलाते फूल
आग का धमाका जला देगा उनके स्कूल
रावेल पुष्प:
कलम सिर्फ शब्द नही लिखती जमीर को जगाती भी है। नफरत से बड़ी ताकत मोहब्बत में होती है
राम पुकार सिंह: प्रेम में जब मनुष्य सवरता है भाव कविता का मन में विचरता है।
विमलेश त्रिपाठी: इश्क कर गया नही खबर
तेरे जुल्फों के आर पार कही एक दिल अजनबी सा रहता है..
शकुन त्रिवेदी : छिपा दिया इतिहास तुम्हारा तो क्या गीदड़ बन जाओगे।
सभागार में उपस्थित अनेक कवियों ने अपनी रचनाएं पढ़ी। कार्यक्रम के संयोजक व संचालक जितेंद्र जीतांशु ने डॉ रजनी साव के काव्य ग्रन्थ पर टिप्पड़ी करते हुए कहा कि संघर्ष और कविता का साथ – साथ चलना आसान नही किन्तु रजनी साव ने ग्रन्थ प्रकाशित करके दिखा दिया कि इंसान अगर चाहे तो वो बहुत कुछ कर सकता है।

कार्यक्रम को सफल बनाने में विशेष भूमिका थी मीनाक्षी सांगनेरिया और उनकी टीम की।
कार्यक्रम में श्रोतागणों – डी .सोनकर, हीरालाल साव, कंचन प्रसाद,भवानीशंकर सारस्वत, जीतेन्द्र जीतांशु, शैलेंद्र शांत, रावेल पुष्प, शिव शंकर सिंह सुमित, विशन सिंह सिखवाल , राजन, डॉ. अभिज्ञात,डॉ किरण सिपानी,सुरेश शॉ, विश्वंभर नेवर, डॉ. गीता दूबे,शकुन त्रिवेदी, रचना सरन,स्वीटी मोदी,अमित राय, डॉ रजनी शाह ,सत्य प्रकाश दुबे, अजेंद्रनाथ त्रिवेदी, सविता भुवानिया,उमा साह, प्रीति साव, सुरेंद्र सिंह, राम पुकार सिंह,विनोद यादव, सविता पोद्दार,कैलाश शर्मा, जयकुमार रुसवा, संजीव कुमार दुबे,डॉ. उर्वशी श्रीवास्तव, डॉ बृजमोहन सिंह, रंजना झा, अश्विनी कुमार, सुशीला सुराणा, प्रणति ठाकुर, विश्वजीत ठाकुर ,मनोज रंजन राजेंद्र मिश्रा, मनोज मिश्रा, के. सुब्रमण्यम, लक्ष्मण केडिया, अनीता राय आदि।
डॉ विमलेश त्रिपाठी, मीनाक्षी सांगानेरिया, मोहन वैरागी, गिर्राज किशोर अरेला, प्रदीप धानुक की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
डॉ विमलेश त्रिपाठी, मीनाक्षी सांगानेरिया, मोहन वैरागी, गिर्राज किशोर अरेला, प्रदीप धानुक की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
– शकुन त्रिवेदी
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