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जी राम जी और विरोध

जी रामजी तथा इसके विरोध के मायने

 भाजपा की राज्य सरकारें या प्रदेश इकाइयां हर जगह जी राम जी पर पत्रकार वार्तायें आयोजित कर रही हैं तथा पार्टी के स्तर पर इसे अभियान के रूप में लिया गया है। सरकारी कार्यक्रमों में ऐसा सामान्यतया कम होता है। विपक्ष के जबरदस्त विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने दृढ़ता के साथ संसद में पारित कराकर संदेश दे दिया था कि इसे हर हाल में क्रियान्वित किया जाएगा।

कांग्रेस पार्टी ने इसके विरुद्ध देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है। कई अन्य दल भी इसके विरुद्ध मोर्चाबंदी कर रहे हैं। इस तरह अब राज्यों में मनरेगा की जगह जी राम जी के अंतर्गत योजनाएं चलेंगीं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों का विरोध और इसके समानांतर भाजपा के द्वारा इसके समर्थन का अभियान चलेगा।

 

सामान्य तौर पर यह स्वीकार किया जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में 2005 में नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट या नरेगा कानून लागू किया था तो उसका इससे लगाव होगा। किंतु कोई कार्यक्रम बंद नहीं हो और उसकी जगह दूसरा आरंभ न हो सके ऐसी परंपरा न पहले थी न आगे स्थापित हो सकती है। देश , काल और परिस्थिति के अनुसार ऐसी योजनाएं और कार्यक्रम बनते हैं तथा उनमें परिवर्तन आने के साथ योजनाएं संशोधित होतीं हैं, कुछ बंद होती हैं और कुछ बिल्कुल नयी आरंभ भी होतीं हैं।

विपक्ष इस कार्यक्रम से महात्मा गांधी नाम हटाने को आधार बनाकर विरोध को एक वैचारिक स्वरूप भी देने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यूपीए सरकार ने भी महात्मा गांधी का नाम सन् 2009 में जोड़ा था। कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार की महात्मा गांधी के नाम पर अलग सेविशेष कार्यक्रम आरंभ करने की सोच नहीं थी इसलिए जारी योजना में नाम जोड़ा गया। विपक्ष की ओर उंगली उठती है कि क्या उनका जी राम जी नाम से विरोध है?

 

क्या कांग्रेस पार्टी और उन विपक्षी दलों को लगता है कि प्रभु राम नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्युलर चरित्र समाप्त होता है? कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के साथी तमिलनाडु के द्रमुक आदि की सनातन और हिंदुत्व के प्रति विचार और व्यवहार से हम परिचित हैं। इसलिए यह भी जी राम जी के साथ महत्वपूर्ण विचारणीय पहलू हो जाता है।

 

वर्तमान कार्यक्रम मनरेगा है ही नहीं। मनरेगा समाप्त कर जी राम जी नया कानून बना है। इसलिए यह आलोचना गलत है कि महात्मा गांधी का नाम हटाकर जी राम जी कर दिया गया है। नरेगा और मनरेगा को बंद करने या इसमें बदलाव की मांग पुरानी है। इस कार्यक्रम ने कागजी खानापूर्ति और भ्रष्टाचार के ऐसे कृतिमान बनाये जिनको रोक पाना मनरेगा ढांचे में संभव नहीं हो पाया। केंद्र से राज्यों की कैग और अन्य रिपोर्ट, स्वतंत्र एनजीओ के अध्ययन तथा जमीन स्तर पर साफ दिख रहा था कि मनरेगा के नाम पर ज्यादातर खानापूर्ति हो रही है। जी राम जी में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण , डिजिटल मॉनिटरिंग,सशक्त सोशल ऑडिट साप्ताहिक पब्लिक डिस्क्लोजर आदि के प्रावधान से भ्रष्टाचार की संभावनाएं क्षीण होती हैं।

किसी कार्यक्रम को बंद करना उस महान व्यक्ति के प्रति धारणा का द्योतक नहीं हो सकता। यह सामान्य समझ की बात है कि 2005 की जिन परिस्थितियों और पृष्ठभूमि में नरेगा आरंभ हुआ उनमें और आज में अनेक मायनों में बदलाव आ गए हैं। दो दशक पहले नरेगा आरंभ होते समय की ग्रामीण और समस्त भारत की आर्थिक स्थिति में व्यापक अंतर आ चुका है। 2011-12 में 25.7 प्रतिशत के आसपास गरीब आबादी थी जबकि 2023 24 में यह 4.86 प्रतिशत रह गई है। तब और आज के गांवों की स्थिति वैसी ही नहीं है। गांव की डिजिटल पहुंच बढ़ी है , बिजली आपूर्ति काफी हद तक सुनिश्चित है, यातायात संपर्क की सुविधा बेहतर हुई है और सामाजिक सुरक्षा आज ज्यादा सशक्त है। भारत 2047 तक विकसित देश का लक्ष्य बनाकर चल रहा है तो गांव और शहर से जुड़े सारे कार्यक्रम उस लक्ष्य के अनुरूप होने चाहिए।

 

इसमें केवल 100 की जगह 125 दिनों के रोजगार की ही बात नहीं है। हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ग्रामीण क्षेत्र को ऐसे सशक्त और टिकाऊ आधारभूत ढांचा देना है जिनसे वे सक्षमता की ओर बढ़ें। इसमें बने निर्मित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत संरचना स्ट्रेट में शामिल किया जाएगा। इससे ग्रामीण विकास से जुड़े सारे काम एक ही व्यवस्था से जुड़ेंगे। जी राम जी में चार मुख्य काम निर्धारित कर दिए गए हैं।

जल से संबंधित कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका से संबंधित संरचना और मौसमी घटनाओं के प्रभाव को प्रभाव को कम करने वाले विशेष कार्य। बाढ़ और सुखार के प्रभावों को कम करने और निपटने के ढांचे शामिल है। जीरामजी का स्वरुप और संस्कार मनरेगा से अलग है। तब काम अलग-अलग श्रेणियों में फैले हुए थे। यहां रोजगार पर फोकस होते हुए भी गांव के लिए स्थिर उत्पादक क्षमता पैदा करने और बढ़ाने यानी आत्मनिर्भरता का भाव है। मनरेगा या पहले के ग्रामीण रोजगार योजनाओं का फोकस ऐसा नहीं था। इसमें ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित विकसित ग्राम पंचायत योजना को अनिवार्य किया गया है। इन योजनाओं को प्रधानमंत्री गति शक्ति जैसे राष्ट्रीय प्रणालियों से भी संबद्ध किया जाएगा।

मिशन अमृत सरोवर के तहत 68, 000 से ज्यादा जल निकाय बने या पुनर्जीवित हुए हैं । इससे खेती और भूजल की स्थिति में परिवर्तन आया है। इसे और शक्ति मिलेगी। जल संचयन , बाढ़ निकासी और मृदा संरक्षण आदि काम होंगे तो गांव की आजीविका सुरक्षित होगी। सड़कों और संपर्क सुविधाओं के साथ भंडारण, बाजार और उत्पादन से जुड़ी सुविधाएं बढ़ेंगी तो किसानों के लिए आय के साधन पैदा होंगे। अगर स्थायी टिकाऊ निर्माण हुए और उनसे रोजगार के अवसर बढ़े तो पलायन में कमी आएगी।

जी राम जी के व्यय की 40% जिम्मेवारी राज्यों पर डालने का विरोध हो रहा है। जिन राज्यों की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है वहां के लिए विचार करना चाहिए। वैसे भारतीय स्टेट बैंक ने एक रिपोर्ट में इस आलोचना को निराधार बताते हुए कहा है कि राज्य इसमें नेट गेनर होंगे। केंद्र सरकार द्वारा राजस्व साझा करने की प्रणाली में राज्यों को 17,000 करोड रुपए का अतिरिक्त आवंटन होगा। आवंटन के आधार पर आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु को थोड़ा नुकसान दिख रहा है जबकि शेष राज्यों में ज्यादा आवंटन का आंकड़ा सामने आता है। राज्यों को भी अपनी वित्तीय स्थिति सशक्त करने की नीतियां अपनानी पड़ेगी। फ्रीबीज यानी मुफ्तखोरी की योजनाओं की जगह ऐसी योजना से लोगों का ज्यादा भला होगा। मुख्य बात है इस व्यवहारिक तथा गांव को आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाने वाले कार्यों का कल्पना के अनुरूप क्रियान्वयन।

यह जिम्मेवारी अंततः राज्यों , स्थानीय प्रशासन, पंचायत तथा सामाजिक -सांस्कृतिक -धार्मिक संगठनों के साथ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर आती है। इस कार्यक्रम में गांव के लोगों की रुचि बढ़ेगी क्योंकि मनरेगा सीमांत और सामान्य मध्यम किसानों के लिए अनर्थकारी बनकर सामने आया था। मुख्य कृषि कार्य के समय कृषि श्रमिकों की उपलब्धता अत्यंत कम हो गई थी। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों ने मूल अनाज उत्पादन वाली खेती छोड़ दी।

बुवाई से कटाई तक किसानों के लिए कष्टकर स्थिति रही है। मनरेगा का नाम सुनकर अनेक किसान रोने लगते थे या गुस्से में आ जाते थे। जहां मशीनों की आवश्यकता नहीं थी वहां भी उनके उपयोग की विवशता पैदा हो गई। बुवाई ,कटाई, निकायी आदि के लिए मशीन खरीदना सबके वश की बात भी नहीं थी। अब काम से कम रबी और खरीफ के मुख्य मौसम में 60 दिनों तक राज्य मनरेगा को स्थगित कर सकते हैं। इससे खेती के लिए श्रमिकों की उपलब्धता की संभावना बढ़ेगी। हालांकि मनरेगा ने पूरी व्यवस्था में जैसा उथल-पुथल मचाया उसमें कृषि को पुनर्स्थापित करना आसान नहीं है फिर भी इसका सकारात्मक असर होगा।

 

कोई भी योजना शाश्वत नहीं हो सकती। अनुभव के आधार पर उनमें संशोधन, परिवर्तन होना चाहिए और जी राम जी भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। भविष्य में परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन या संशोधन की स्थिति उत्पन्न होती है तो होगी। किंतु अगर कुछ नेताओं, एक्टिविस्टों आदि को जी रामजी नाम रखने से समस्या है तो इसका उपचार नहीं। सभी देवी-देवता केवल मनुष्य से परे शक्ति संपन्नता के ही नहीं सात्विकता, नैतिकता ,समाज के लिए आत्मोत्सर्ग तथा सर्व कल्याणकारी चरित्र वाले हैं। उनके नाम से सरकारी कार्यक्रमों का सेक्यूलर चरित्र प्रभावित नहीं होता। इसमें आध्यात्मिकता एवं आम लोगों के लिए योजना की पवित्रता बनाए रखने की जो भावना पैदा हो सकती है उससे व्यापक सेक्यूलर भाव क्या हो सकता है?

 

अवधेश कुमार, ई-30, गणेश नगर, पांडव नगर कंपलेक्स, दिल्ली -110092, मोबाइल -9811027208

 

 

 

 

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