आचार्य विद्यानिवास मिश्र : शताब्दी स्मरण

*विश्व चेतना की अनुभूति से उत्पन्न लेखन था आचार्य विद्यानिवास जी का – डॉ. ऋषिभूषण मिश्र*
कोलकाता, 10 जनवरी। “आचार्य विद्यानिवास मिश्र का लेखन विश्व चेतना की अनुभूति से उत्पन्न भावावेश था। वे लोक को विश्व व्यवस्था की प्राथमिक इकाई मानते हैं इसलिए नीम पेड़ की चिंता से आरंभ आचार्य मिश्र का सरोकार संपूर्ण सृष्टि की मंगलकामना में साकार होता है।’ — ये उद्गार हैं प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. ऋषिभूषण चौबे के, जो शनिवार को श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के तत्वावधान में आयोजित ‘पं. विद्या निवास मिश्र : शताब्दी स्मरण’ में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे
समारोह की अध्यक्षता कर रहे एडवोकेट श्री योगेशराज उपाध्याय ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में आचार्य मिश्र के साहित्य में शिव तत्व का उल्लेख करते हुए शैव- वैष्णव एकात्मता की सनातन अवधारणा को वर्तमान संदर्भ में उपस्थित किया।
समारोह के विशिष्ट वक्ता राष्ट्रीय होम्योपैथिक संस्थान के राजभाषा एवं संप्रेषण सलाहकार श्री अजयेन्द्रनाथ त्रिवेदी ने मिश्र जी के साहित्यिक अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि पंडित जी ने लोक परंपरा के आलोक को फैलाने का स्तुत्य कार्य किया है।
समारोह का प्रारंभ मंत्री श्री बंशीधर शर्मा ने अपनी स्वरचित सरस्वती वंदना से किया । विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर अपनी रचना का पाठ युवा कवि रमाकान्त सिन्हा ने किया। अतिथियों का अंगवस्त्र प्रदान कर स्वागत किया सर्वश्री परमजीत पंडित, मनोज काकड़ा एवं श्रीमोहन तिवारी ने। स्वागत भाषण दिया साहित्यमंत्री डॉ. तारा दूगड़ ने तथा धन्यवाद ज्ञापन किया उपमंत्री श्री सत्यप्रकाश राय ने। कार्यक्रम का कुशल संचालन किया डॉ. कमल कुमार ने।
समारोह में सर्वश्री सीताराम तिवारी, राम पुकार सिंह,अजय कुमार पाण्डेय,भागीरथ सारस्वत, अनिल दुबे, कालू तमांग, पूजा प्रसाद, अरविन्द तिवारी, डॉ जयप्रकाश मिश्रा, विजय कुमार पाण्डेय, विनोद यादव एवं गायत्री बजाज प्रभृति विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोग सभागार में उपस्थित थे।
–बंशीधर शर्मा, मंत्री
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