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महिला सशक्तिकरण के नाम

अब स्त्री कमजोर नहीं … 

हाल -फ़िलहाल में  नेपाल के एक साहित्यिक सम्मलेन में शामिल होने का मौका मिला। काफी दूर -दराज से लोग आये हुए थे , जिनमे महिलाओं की भी अच्छी -खासी भागीदारी थी।  सर्दी का समय बड़े -बड़े सूटकेस , कंधे पर बैग और चेहरे पर आत्मविश्वास।  देखकर कही से ये नहीं लग रहा था कि ये वही अबला नारी है जिनके बारे में राष्ट्रकवि  मैथलीशरण गुप्त ने कभी लिखा था ” अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आँचल में है दूघ और आँखों में पानी। ”

 

खुद के लिए जिंदगी जीना अपनी पहचान बनाना और अपनी योग्यता को पंख देना आज की सशक्त नारी का सपना है लेकिन इसका मतलब ये कदापि नहीं है की इस  प्रकार की स्त्रियों ने 

अपने घर -संसार के दायित्वों से मुंह मोड़ लिया अपने पतियों की अवहेलना कर दी।  जी नहीं उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से किया है और आगे भी कर रही है। 

 बस अब उन्होंने अपने लिए जीना सीख लिया।  घर के प्रबंधन की रचना इस प्रकार से की है की वे बीच -बीच में घर से बाहर  जाकर अपनी प्रतिभा की रौशनी को और तेज कर सके ताकि

 वो रौशनी दूर – दूर तक उनकी कामयाबी की कथा कह सके।

नेपाल -भारत के साहित्य महोत्सव में कानपूर से आयी थी कवियत्री सीमा वर्णिका , नितांत अकेली किन्तु अपनी हिम्मत के साथ दूसरी ओर इंदौर की कवियत्री शीतल सिंह राघव।

इन लोगो ने अपने सपनों को साकार करने के लिए ये सिद्ध कर दिया की औरत कोमल है कमजोर नहीं।

भारत के एक कोने से दूसरे देश नेपाल जाना कोई आसान बात नहीं है , रास्ते की तकलीफे, साथ के सामान का बोझ, आने से लेकर , जाने तक की व्यवस्था:  कहा रुकना है , कैसे

रुकना है ,बस से जाना है  की टेक्सी पकड़ना है  फिर बस – टेक्सी कितने बजे छूटेगी और  कब  कहा  पहुंचाएगी  तत्पश्चात  बॉर्डर से  भारत के उस स्टेशन तक पहुंचना जहाँ से आप अपने

 गंतव्य के लिए ट्रेन  ले सके और इसके आलावा  कुछ समय के लिए होटल की व्यवस्था भी करना  इन सभी पर होमवर्क करना और  उस दौरान मस्तिष्क में उठने वाले विभिन्न विचारों को नियंत्रित

करना तथा अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहना आदि ऐसे अनेक बिंदु है जिनपर  कदम उठाने से पहले सोचने – विचारने की आवश्यकता होती है।

 दृढ़ता का प्रतीक ये आज की  वो नारियां है जिन्होंने ” जी लो जिंदगी ” के स्वर को बुलंद किया है वो भी उस दौर में जहाँ आज भी पुरुष ये कहने से नहीं थकते की औरतों की बुद्धि घुटनो में होती है

या फिर मेरे बगैर तुम्हारा कोई वजूद नहीं है!

मेरा मानना है कि  बुद्धि -विश्वास -ऊर्जा – हौसलों के साथ जिंदगी जीने वाली उन तमाम स्त्रियों की सिर्फ प्रशंसा ही नहीं करनी चाहिए अपितु उन्हें बधाई भी देनी चाहिए   क्योंकि ऐसी महिलाये  आने वाली बच्चियों के लिए

 प्रेरणास्रोत है ।  महिला सशक्तिकरण का अद्भुत उदाहरण है।  ये ऐसा  उदाहरण है कि जिस दौड़ में पुरुष खाली हाथ दौड़ता है उसी दौड़ में ये  महिलाएं अपने कंधो पर जिम्मेदारियों का बोझ लेकर दौड़ती है.

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