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बहुत अभिशप्त ये ऊंचाईयां है

06.01.2005

नियति में आपकी विषपान होगा, जुबां पे आपकी सच्चाइयां है – डॉ शिव ओम अंबर

1. लखनऊ पहुँचने पर पता चला कि नीरज जी मेरे सन्दर्भ में अपनी कुछ पूर्वाग्रहग्रस्त प्रतिक्रियाएँ सोम जी, अनूप श्रीवास्तव आदि से प्रकट कर चुके हैं, सभी ने अलग-अलग चर्चा की।

2. नीरज जी की अनिच्छा के बावजूद कार्यक्रम के संचालन की ज़िम्मेदारी मुझे ही दी गई।

3. किन्तु इस बार मंच पर बेहद मर्यादित रहा नीरज जी का व्यवहार।

4. इटावा की घटना की चर्चा त्वरा के साथ मित्रमण्डली में हुई है, डॉ० विष्णु को इसकी पूरी जानकरी थी।

5. ‘‘शाबाश मेरे शेर’’। कहकर रामेन्द्र जी ने पीठ थपथपाई।

6. नीरज जी जी मंच पर जाने से पूर्व सफ़ाई-सी देते रहे।

7. इटावा के साथ मंच-यात्रा के तीन दशकों में तीन विशिष्ट घटनाएँ जुड़ीं – सबसे पहले, श्री बेंकटबिहारी पागल की एक अशालीन रचना पर मेरी संचालकीय टिप्पणी को जन-समर्थन मिला।

श्री आज़म खां के खिलाफ़ मेरी टिप्पणी और रचना से उत्तेजित मुलायम सिंह जी की तुलना में जनता मेरी तरफ़ रही।

और इस बार नीरज जी के विपक्ष में जनता भी मेरे साथ थी, नयी पीढ़ी के कवि भी।

07.01.2005

1. डॉ० रजनी सरीन बाक़ायदा निर्वाचित होने के बावजूद कोर्ट के आदेशों के जाल में फँसकर अध्यक्ष नगर पालिका परिषद् के आसन पर बैठ नहीं सकी थीं, यहाँ उच्च न्यायालय का स्थगनादेश अपने पक्ष में लेकर भी त्रिगुणायत जी प्रधानाचार्य पद का आनन्द नहीं ले पा रहे हैं।

2. हाईस्कूल तथा इण्टरमीडिएट की फ़ाइनल कक्षाओं के बच्चे तो नये वर्ष मे मात्र हाज़िरी लगवाने आये थे, ग्यारहवीं के छात्र भी चौथे घण्टे के आने से पर्याप्त पहले विदा हो जाते हैं।

3. विद्यालय आकर हस्ताक्षर करने के बाद आजकल ओशो की ‘‘एक ओंकार सतनाम’’ का अध्ययन करता हूँ, पंडित रामकिंकर जी को पढ़ता हूँ और अर्द्धवार्षिक परीक्षा की कुछ उत्तर-पुस्तिकाएँ जाँच लेता हूँ।

4. शिक्षक संघ (शर्मा गुट) के ज़िला अध्यक्ष के चुनाव की गहमागहमी है। इस बार नरेन्द्र पाल सिंह सोलंकी लालाराम दुबे के साथ हैं।

5. हमारी पूरी इकाई अनिल कुमार सिंह को नहीं लालाराम दुबे को ही समर्थन दे रही है, 16 जन. को वोट पड़ेंगे, एक प्रतिनिधि मैं भी हूँ।

ग़ज़ल

चतुर्दिक् खाइयाँ ही खाइयाँ हैं,

बहुत अभिशप्त ये ऊँचाइयाँ हैं।

यहाँ से है शुरू सीमा नगर की,

यहाँ से हमसफ़र तनहाइयाँ हैं।

हुईं किलकारियाँ जबसे सयानी,

बहुत सहमी हुई अँगनाइयाँ हैं।

हमारी हर बिवाई एक साखी,

बदन की झुर्रियाँ चौपाइयाँ हैं।

नियति में आपकी विषपान होगा,

ज़ुबां पे आपकी सच्चाइयाँ हैं।

संकलन: प्रीति गंगवार, फरुखाबाद, उत्तरप्रदेश

 

 

 

 

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