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वरेण्य कथा संग्रह

‘ वरेण्य ‘ कहानी संग्रह की समीक्षा

पुस्‍तक का नाम –वरेण्‍य (कहानी संग्रह)
लेखक-श्री नन्‍द लाल मणि त्रिपाठी ‘पीताम्‍बर’
प्रकाशक –कश्‍यप पब्लिकेशन, बी-15, जी 1, दिलशाद एक्‍सटेंशन-2, डी एल एफ,
गाजियाबाद, उत्‍तर प्रदेश
संस्‍करण-वर्ष 2025 (आईएसबीएन -978-93-82422-81-5)
पृष्‍ठ संख्‍या -116
मूल्‍य—रूपये 250/-

यथार्थ से परिचित कराती कहानियॉं

मानव जीवन के विकास के साथ कहानी का भी विकास मानना पडता है । मानव स्‍वभाव की यह विशेषता है कि वह अपने अनुभवों को दूसरो को सुनाना तथा दूसरों के अनुभवों को सुनना चाहता है । इसमें उसकी अपूर्व उत्‍सुकता रहती है ।

अत:अनादि काल से ही इस प्रकार की घटनाओं की कथा सुनता आ रहा है । यहीं से कहानी का प्रारंभ माना जा सकता है । प्रारंभिंक अवस्‍था में कहानी का रूप मौलिक रहा । फिर संस्‍कृत साहित्‍य के गद्य युग से इसका लिखित विकास होता चला आ रहा है । संस्‍कृत साहित्‍य में पंचशील, हितापदेश, बेताल पच्‍च्‍ीसी, कथा सरित सागर आदि कहानी संग्रहों का सृजन हुआ । जैन और बौद्ध युगों में जातक तथा धर्मकथाएं प्रचलित हुई । इन कहानियों की शैली तथा इनके उददेश्‍य भिन्‍न थे । अत: उनमें कहानी की कलात्‍मकता का प्रभाव है ।

हाल ही में प्रकाशित ‘वरेण्‍य’ (कहानी संग्रह) मेरे अग्रज और परम आदरणीय पीताम्‍बर जी की पुस्‍तक मुझे प्राप्‍त हुई । मेरे लिए यह बडा मुश्किल काम है की उनकी इस पुस्‍तक में समाहित 37 कहानियों की समीक्षा कर पाना । फिर भी मैं अपने अल्‍प ज्ञान से प्रयास कर रहा हूँ ।

सफर का सच –कहानी अति प्रेरणादायक है राष्‍ट्रवादी और एक सच्‍चे देशभक्‍त की कहानी है । आज के सोशल माडिया बहुत कुछ नकारात्‍मक परोसा जा रहा है उसे आज का समाज आसानी से ग्रहण कर लेता है । दिव्‍यांश चटर्जी का जीवन हम सभी की ऑंखें खोलता है । कहानी वास्‍वकिता को प्रकट करती है और दिव्‍याशों के सम्‍मान के लिए प्रेरित करती है ।

गंगा तेरा पानी अमृत निर्झर बहता जाये –कहानी में दो बहादुर बच्‍चें आसिफ और बिस्मिल्‍लाह की बहादुरी को दर्शाया गया है कहानी अति मार्मिक है और बच्‍चों के लिए शिक्षाप्रद है । मेरा विचार है कि इस कहानी का नाम बहादुर बच्‍चे रखा जाता तो बेहतर होता।

पटेबाज –कहानी में शिवहरे की पहलवानी का जिक्र है । पहले जमाने में पहलवानी ही गांव में होती थी यह एक मनोरजन से भरा खेल होता था और गांव के बूढे और बच्‍चे बडे उत्‍साह से भाग लेते थे । आज भी हरियाणा के गांव में यह खेल प्रसिद्ध है । कहानी दिलचस्‍प है ।

वज्रमणि – इस कहानी के मुख्‍य पात्र पारस पर आधारित है । उस जमाने की तरह आज भी हमारे देश में ऊँच नीच, जात-पात, छोटा बडा समाप्‍त नहीं हुआ । खासकर आदिवासी क्षेत्रों में यह आज भी सर्वोपरि है । कहानी ठाकुर रूद्रप्रताप सिंह और उनके अमानवीय पुत्र अर्थतेन्‍द्र सिंह के बीच से होकर पारस पर जा टिकती है । कहानी में इंसान के कर्म और उसके किये कार्यो का लेखा जोखा को दर्शित किया है । जैसे कर्म होंगे वैसा फल मिलेगा ।

अमानवीयता का कैसे अंत होता है इस कहानी में पता चलता है ।उसी प्रकार ‘खुशामद’ कहानी भी रॉबिन नामक कथानायक से संबंधित है जिसपर जनजातीय और धर्मपरिवर्तन के बारे में बताया गया है और भारतीय सनातनी आस्‍था को लेकर भी चल रहे है । यह एक सही बात है । ‘चिराग तले अंधेरा’ कहानी में कृष्‍णा ने सिराज के सरपरस्‍ती में अपना जीवन संभाला और उनकी बेटी को पत्‍नी बनाकर उसे शिक्षित कर एक मिसाल कायम की ।

इसके अंर्तगत उनकी ‘अन्‍तर्ध्‍यान’, ‘विजुगुप्‍सा’ (जिसका अर्थ मुझें समझ में नहीं आया,एवं प्रतिनायक कहानियां हैं । ‘वरेण्‍य’ कहानी हासिम पर आधारित है जो कभी पूरी न हो पाई उसकी अपनी बुरी आदतों के कारण उसका जीवन ‘वरेण्‍य’ होकर रह गया । यह कहानी आज के राजतंत्र के दावपेचों पर आधारित है । होली के रंग कहानी,प्रायश्चित, साजिश,अमल, कलाकार कहानियां जीवन की जटिलता को पूरी नर्मिमता से उधेडती हैं ।यह मनुष्‍य को यथार्थ परिवेश में झांकने को विवश करती है ।

इन कहानियों में जीवन यथार्थ को अलग अलग कोणों से देखा, परखा, समझा गया है ।यह सभी कहानियॉं परिवर्तित मूल्‍यों से उत्‍पन्‍न्‍ संघर्ष को लेखा जोखा दर्शाती है । आज का व्‍यक्ति भ्रष्‍ट सामाजिक व राजनीतिक व्‍यवस्‍था में जीने के लिए अभिशप्‍त है ।प्रशासन, पुलिस, न्‍याय व्‍यवस्‍था , धर्म औधौगिक प्रतिष्‍ठान के सभी जगह भ्रटाचार पनप चुका है । नैतकिता और मानवीय संवेदनाओं को ह्रास हुआ है 1 इन कहानियों में आधुनिकता का स्‍वर पहले की अपेक्षा अधिक सशक्‍त्‍ ढंग से मुखरित हुआ है । सभी कहानियों में जीवन और परिवेश को उसकी समग्रता में आत्‍मसात किया है

कहना न होगा कि डॉ नन्‍दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्‍बर जी का यह कहानी संग्रह वर्तमान के नये परिवेश में लाजवाब है । पाठकों को इन कहानियों से अच्‍छी प्रेरणा मिलेगी और यह युवाओ में एक नयी ऊर्जा का संचार करेगी । कई सम्‍मानों से पुरस्‍कृत हुए डॉ पीताम्‍बर जी को मैं इस कहानी संग्रह के लिए ह्रदय से साधुवाद देता हूँ । आशा करता हूँ कि भविष्‍य में भी वे अपनी लेखन का कार्य निरंतर जारी रखेगें ।

डॉ. वासुदेवन ‘शेष’ समीक्षक
डी.लिट (हिंदी)
हिंदी प्रचारक, कवि, लेखक ,अनुवादक समीक्षक
चेन्‍नई -600 005
चलभाष -9444170451

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