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“संतप्त धरा”

“संतप्त धरा” 

 

 

हे धारिणी !
बहती है तुम्हारे उर में,
लहरें सदा उन्मीलित,
सदियों से करती हो सृजन,
फिर हो क्यों तृष्णा दमित,
मुरझाई है तुम्हारी काया,
कैसी यह अनोखी माया,
भाग्य के कर से उत्पीड़ित,
क्यों उर्वरा हृदय तुम्हारा,
सर्वदा ही तप्त,
रुद्रकंठ सम विष दग्ध,
क्यों हो इतनी संतप्त,
धरा ने देखा,
व्योम कह रहा मौन ,
न बरसेंगे नेह बदरा जब तक,
नहीं करुणा की होगी वृष्टि,
संतप्त रहेगी तब तक सृष्टि,
जब तक जन्म लेंगी गणिकाएं,
हो रही व्यथित व्यभिचार से वरमालाएं,
उत्पीड़ित हैं बल प्रयोग से ललनाएं,
उजड़ रहीं उनकी मर्यादाएं,
दहेज की चुन्दड़ी ओढ़
विदा हो रही कन्याएं ,
जब तक भेद है,
नारी और नर में,
कुचली जाती,
नारी की संवेदनाएं,
तब तक कैसे ,
हो सकेंगी विकसित,
बालियां चमन की,
धन धान्य पुष्प सौरभ की,
जब तक न्याय और ,
मानवीयता होंगे खंडित,
तब तक तुम रहोगी संतप्त।

 

अंजू मनोत (एडवोकेट)
कोलकाता

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