### *एक राजा ऐसा भी*

#### _मनकापुर रियासत का संक्षिप्त इतिहास_

ग्यारहवीं शताब्दी तक यह सम्पूर्ण क्षेत्र घने जंगलों से आच्छादित था। यहाँ मुख्य रूप से थारू आदिवासी जनजाति और भर समुदाय के लोग निवास करते थे। एक निर्णायक युद्ध में भर जाति की विजय हुई और उनके मुखिया ने ‘मणिकपुर’ गाँव बसाकर इसे अपना मुख्यालय घोषित कर दिया।
सत्रहवीं शताब्दी में गोंडा के राजा दत्त सिंह ने बंधोल गोंडी वंश के शासकों से मनकापुर छीन लिया और अपने शिशु पुत्र अजमत सिंह को इस नई रियासत का शासक नियुक्त किया। यहीं से मनकापुर में विशेन राजपूत वंश की नींव पड़ी। इस वंश ने अवध के नवाबों और अंग्रेजों से अपने संबंधों का निर्वहन संतुलन और संयम के साथ किया।
मनकापुर रियासत ने सामाजिक और राजनीतिक विकास में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन 1929 में महात्मा गांधी ने मनकापुर राजभवन का दौरा किया और तत्कालीन राजा राघवेंद्र प्रताप सिंह से संवाद किया। स्वतंत्रता के पश्चात राजा आनंद सिंह चार बार सांसद चुने गए और क्षेत्र के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया।
वर्तमान में मनकापुर रियासत उत्तर प्रदेश के गोंडा जनपद के अंतर्गत है। आज भी यह क्षेत्र प्रदेश के अन्य भागों की तुलना में अधिक हरा-भरा और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। यहाँ उद्योग के रूप में आई.टी.आई. यानी इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री स्थित है, जिसे वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्जीवित और गतिमान किए जाने की जरूरत है।
#### *राजा आनंद सिंह*
4 जनवरी 1939 को राजा आनंद सिंह का जन्म, पिता राजा राघवेंद्र प्रताप सिंह और दादा राजा रघुराज सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में हुआ।
उन्होंने इलाहाबाद के प्रतिष्ठित केल्विन कॉलेज से बी.एससी. की शिक्षा प्राप्त की। उनकी राजनीतिक यात्रा 1971 में आरंभ हुई। कांग्रेस सिंडीकेट गुट के समर्थन से उन्होंने अपने चाचा के विरुद्ध चुनाव लड़ा और विजय प्राप्त की। उन्हें कांग्रेस इंदिरा गुट का भी समर्थन प्राप्त था।
जीवनपर्यंत वे ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन, अवध तथा राघवेंद्र ग्रामीण विकास एवं अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष रहे।
उनका विवाह पूर्व राज्यसभा सांसद बिंदुमती जी की पुत्री वीणा सिंह से हुआ।
वे 5वीं, 7वीं, 8वीं और 9वीं लोकसभा के सदस्य चुने गए। 2012 से 2017 तक समाजवादी पार्टी से विधायक रहे और अखिलेश यादव सरकार में कृषि मंत्री का दायित्व संभाला।
राजा आनंद सिंह ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी – तीनों दलों में रहकर केवल एक लक्ष्य साधा: अपने रियासत और क्षेत्र का विकास। वर्तमान में उनके सुपुत्र कीर्ति वर्धन सिंह मनकापुर रियासत के राजा और राजा आनंद सिंह की राजनीतिक विरासत के संवाहक हैं।
–*अतीत के दर्पण से: भावनाओं की पुकार*
जीवन में कुछ परछाइयाँ ऐसी होती हैं जो निर्मल चांदनी में हमारे साथ-साथ चलती हैं। वे हृदय की गहराइयों में सुषुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं, और अंतर्मन उन्हें प्रत्यक्ष देखने के लिए छटपटाता रहता है।
इसी छटपटाहट के बीच कभी संवेदना इतने निकट आकर हृदय को स्पंदित कर जाती है, तो कभी उसे आत्मसात करने के लिए प्रेरित करती है। इसी जद्दोजहद में जीवन बीत जाता है। मनुष्य संवेदना के आवरण को उलट-पुलट कर देखता रहता है। कब प्रकृति, प्राणी और परमात्मा का त्रिगुणात्मक स्मरण वर्तमान से अतीत में विलीन हो जाता है, और काया से आत्मा पक्षी की भाँति उड़ जाती है, इसका उसे भान भी नहीं रहता। फिर भी कहीं कोई चकोर, उसकी चाहत का विश्वास लिए, अब भी परमात्मा मिलन हेतु अनुष्ठानरत रहता है।
मेरी नियुक्ति कुछ समय के लिए अयोध्या स्थित भारतीय जीवन बीमा निगम के मंडलीय प्रशिक्षण केंद्र में प्राचार्य पद पर थी। मैं प्रत्येक शनिवार गोरखपुर से बस द्वारा आता और सोमवार को वापस जाता था। चार वर्षों के अयोध्या प्रवास में केवल एक बार ऐसा अवसर आया जब मुझे गोरखपुर से मनकापुर की ट्रेन लेनी पड़ी। मनकापुर से अयोध्या के लिए अगली ट्रेन साढ़े तीन घंटे बाद थी।
वे तीन घंटे मैं आजीवन नहीं भूल सकता। प्रातः प्रभात का वह समय, वह शांति, वह मौन… सब कुछ मुझे भीतर तक झकझोर रहा था। एक अदृश्य पुकार मुझे राजा से साक्षात्कार के लिए प्रेरित कर रही थी। जिससे कभी मिला नहीं, जिसने कभी जाना नहीं, उससे संवाद की उत्कंठा बलवती हो रही थी।
मैंने सोचा, चलूँ… पर कदम उठते ही रुक जाते। मन में संकोच था। जीवन का अधिकांश भाग बीत चुका है, अब जाकर क्या लाभ? उस क्षण मैंने गहराई से अनुभव किया कि मानव स्वार्थी होता है। वह हर संबंध, हर संवेदना की कीमत अपने स्वार्थ से तौलता है।
इसी ऊहापोह में तीन घंटे बीत गए और मनकापुर से ट्रेन अयोध्या के लिए चल पड़ी।
हाँ, मैं राजा मनकापुर, राजा आनंद सिंह जी की बात कर रहा हूँ।
मैं न कभी मनकापुर गया, न वहाँ का निवासी हूँ, न रैयत। पर कुछ राजपूत भावनाओं के प्रवाह ने मुझे राजा मनकापुर से जोड़ दिया। अनुभूति है, वास्तविकता का स्पर्श भी है, पर साक्षात्कार कभी नहीं हुआ।
वर्ष 2025 में समाचार पत्र के माध्यम से सूचना मिली कि राजा मनकापुर आनंद सिंह जी अब इस लोक में नहीं रहे। जिससे कभी मिला नहीं था, उसके निर्वाण का समाचार महीनों तक मुझे व्यथित करता रहा।
स्वतंत्रता के पश्चात रियासतों के भारत में विलय के बाद राजाओं के वैभव को बनाए रखने के लिए ‘प्रिवी पर्स’ की व्यवस्था कुछ समय तक चली। बाद में भूमि सीलिंग और दान में चली गईं। पर राजपरिवारों ने अपनी भव्यता कम नहीं होने दी। उन्होंने भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। कहा जाता है कि 1980 में कांग्रेस को पुनः सत्ता में लाने में पूर्व रियासतों के राजाओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मनकापुर रियासत भी इस सच्चाई से अछूता नहीं रही।
निस्संदेह, मनकापुर रियासत का इतिहास गौरवशाली और परंपराओं से समृद्ध है। इस पर गर्व होना स्वाभाविक है।
राजा आनंद सिंह राजनीति के ऐसे स्तंभ थे जिन्होंने तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद राजा की गंभीर और गौरवशाली परंपरा को नहीं त्यागा। बदलते समय, समाज और राजनीति में उन्होंने न कभी समझौता किया, न झुके। उन्होंने मर्यादा, नैतिकता और मानवीय मूल्यों को सदैव सर्वोपरि रखा।
उभरती नई शक्तियों से न उन्होंने प्रतिस्पर्धा की, न भागदौड़ को महत्व दिया। सागर की गहराई जैसा उनका मन, चित्त और व्यक्तित्व था। अपने आभा मंडल से उन्होंने सभी को जोड़े रखा। सभी राजनीतिक दलों ने उन्हें सम्मान दिया। उनके कट्टर विरोधी भी उनके सद्गुणों की प्रशंसा करते थे। कितने ही मतभेद रहे हों, उन्होंने कभी उसे मानवीय संवेदनाओं पर हावी नहीं होने दिया।
मैं राजा आनंद सिंह से भले ही कभी नहीं मिला, पर पिछले 40-45 वर्षों से उन्हें अपने भाव-दर्पण में जीवित रखा है। राजा और राजनीतिज्ञ की परंपरा के कारण उनका सामाजिक दायरा इतना विराट था कि यदि मैं मिलता भी, तो मेरी हैसियत तिनके से अधिक नहीं होती। इसलिए मैंने राजा आनंद सिंह को सदैव प्रकृति, प्राणी और परमात्मा के समन्वय के रूप में अपने भीतर संजोकर रखा।
यह मेरे लिए गौरव है, अभिमान है और आत्मबोध का सत्य है। था, है और रहेगा।
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