चाणक्य अभी भी जिंदा है


छिपा दिया इतिहास तुम्हारा तो क्या गीदड़ बन जाओगे
बर्बरता के भय से क्या बिल में घुस जाओगे
स्वाभिमान को गिरवी रख कर कैसे जी पाओगे
बहु -बेटियों की लुटती इज्जत कब तक सह पाओगे।
सुप्त पड़ी पौरुष ज्वाल इसको धधकाओं तुम
लहू में कैसे आए उबाल इसको दहकाओं तुम
जिन हाथों को बांध कर तुम अपनी लाचारी जतलाएं
उन हाथों को वज्र बनाके पुनः इतिहास दोहराओं
तुम।
उठो बांकुरो रणभूमि में होगा लहू से अब अभिषेक
जिसने तुमको कम आंका उनका बदलो भेष
उनका बदलो भेष बता दो तुम दुनियां को
चाणक्य अभी भी जिंदा है नही बंधे है केश
नही बंधे है केश।।
– शकुन त्रिवेदी
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