Wednesday , May 20 2026

बंगाल में राजनीतिक हिंसा

बंगाल में राजनीतिक हिंसा रोकना भाजपा सरकार की सबसे बड़ी चुनौती

 

 

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार गठन के बाद उम्मीद बंधी है कि चुनाव उपरांत हिंसा नियंत्रित होगी। चार राज्यों एवं एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हुए जिनमें तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल एवं तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी एवं घटकों की पराजय हुई। किंतु जैसा डरावना दृश्य पश्चिम बंगाल में दिखा वैसा कहीं नहीं। चुनाव परिणाम के बाद पश्चिम बंगाल से चार तरह की नकारात्मक और चिंताजनक तस्वीरें सामने आयीं। एक, चुनाव के बाद समस्त कोशिशें के बावजूद हिंसा की घटनाएं सामने आती रही। दूसरे, तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेत्री ममता बनर्जी विनम्रता से जनादेश स्वीकारने की जगह कह रहीं हैं कि हमारी 100 सीटें चुनाव आयोग ने लूट लिया। तीन, विपक्षी नेताओं ने सबसे ज्यादा समर्थन और सहानुभूति तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी को दिया है। केरल से माकपा नेतृत्व वाले वाम मोर्चा की सत्ता चली गई लेकिन कोई उनके लिए छाती नहीं पीट रहा है। एमके स्टालिन और द्रमुक विपक्ष के साथ भाजपा विरोधी अभियान और आक्रामकता में लगातार शामिल रहा है लेकिन उनके साथ भी यह व्यवहार नहीं। इन दोनों राज्यों के नेताओं ने न चुनाव आयोग पर कोई आरोप लगाया और न  कहा कि हम हारे नहीं। दोनों राज्यों की स्थिति बिलकुल सामान्य है। ममता बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि मैं चुनाव हारी नहीं हूं इसलिए इस्तीफा नहीं दूंगी। अंततः राज्यपाल ने संवैधानिक शक्ति का दुरुपयोग करते हुए उन्हें बर्खास्त किया। यह भारतीय राजनीति के इतिहास की असामान्य घटना थी। हालांकि बंगाल में इनसे अलग चौथी तस्वीर है जो हम सबको बहुत कुछ सोचने को विवश करती है। प्रदेश से आई तस्वीरों और वीडियो में लोग जगह-जगह चुनाव परिणाम का विजय उत्सव मनाते दिख रहे हैं। कहीं विजय जुलूस निकल रहे हैं, कहीं होली खेली जा रही है ,कहीं कीर्तन हो रहे हैं,  मानो उन्हें मुक्ति मिली हो। इनमें महिला, पुरुष, दलित, जनजाति , युवा , किशोर सब शामिल दिखाई देते हैं। अगर इन तस्वीरों को नजरअंदाज कर देंगे तो पश्चिम बंगाल के सत्य तक नहीं पहुंच सकते। ये सारे विजय उत्सव भाजपा द्वारा ही आयोजित नहीं थे। स्वत:स्फूर्त तरीके से लोग ऐसा कर रहे हैं। बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनका भाजपा से किसी तरह का संबंध नहीं।

 चौथी तस्वीर बताती है कि 15 वर्षों के तृणमूल कांग्रेस शासन के विरुद्ध बड़े वर्ग में व्यापक असंतोष था जिससे  वे मुक्ति चाहते थे। दूसरी ओर इसका अर्थ यह भी है कि हिंसा की तस्वीरों से ज्यादा सकारात्मक लोक मानस पूरे प्रदेश में है। यह  लोक व्यवहार आश्वस्त करता है कि बंगाल हिंसा के दौर से बाहर निकलेगा तथा शांति‌ व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा। किंतु यह यूं ही नहीं हो सकता। हालांकि प्रदेश में जगह-जगह कुछ हिंसा तो तृणमूल नेताओं द्वारा मकानों ,जमीनों, कार्यालयों पर कब्जे के संदर्भ में हुई जब लोग स्वयं निकलकर इसे मुक्त कराने लगे। इसी तरह हिंदुओं के कई धर्मस्थलों या धर्म स्थानों की मुक्ति के दृश्य भी सामने आए। कई जगह हमने देखा कि चुनाव परिणाम के बाद गांवों में कुछ लोग नारा लगाते हुए निकले और गुस्से में कोई तृणमूल का दिखा तो उसकी हल्की पिटाई कर दिया, उसके घर पर दो-चार डंडों का प्रहार कर फिर नारा लगाते चलते बने। ये दृश्य भी हिंसा के ही है और रुकने चाहिए पर ये डरावने नहीं हैं। यह बताता है कि तृणमूल शासन में दादागिरी और माफियागिरी का साम्राज्य हो गया था। इसके विरुद्ध लोगों में गुस्सा होना स्वाभाविक है।

दूसरी ओर अगर विजय जुलूसों पर बमों से हमला हो या खींचकर मार दिया जाए या सरकार बदल गई इसके नाम पर लोगों की पिटाई हो, हत्या हो तो साफ है प्रदेश में स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण नहीं है। सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी जो तब मुख्यमंत्री नहीं थे के सहयोगी देवनाथ रथ की हत्या की हो रही है। उन्हें उत्तर 24 परगना के मध्यग्राम में सड़क पर ढेर करअंदर गोली मारी गई। हत्यारे इतने दुस्साहसी थे कि उन्होंने सड़क पर ओवरटेक कर गाड़ी आगे से घेरा, मोटरसाइकिल से उतरकर छाती में प्रोफेशनल हत्यारे की तरह से गोली मारी और देखा कि उनके मृत्यु हुई कि नहीं। इसमें गिरफ्तारियां बता रही है कि यह पूर्व नियोजित था जिसमें भाड़े के हत्यारों का उपयोग हुआ था। इसे राजनीतिक हिंसा से अलग करके नहीं देख सकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव परिणाम की संध्या भाजपा केंद्रीय कार्यालय में भाषण देते हुए कहा कि राजनीतिक हिंसा रुकनी चाहिए और हमें बदले की नहीं बदलाव की राजनीति करनी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने चुनाव परिणाम के बाद ही बयान दिया था जो भी पार्टी से जुड़ा व्यक्ति हिंसा करेगा उसे निष्कासित कर दिया जाएगा। फिर इस पर पत्रकार वार्ता करके स्पष्ट अपील की गई एवं चेतावनी दी गई। सत्ता संभालते हैं शिवेंदु अधिकारी ने सबसे ज्यादा फोकस कानून व्यवस्था पर किया और धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी है।

 

चुनाव से जुड़ी हिंसा चाहे वह पूर्व हो या बाद में इस बात का प्रमाण होता है कि कोई दल या नेता हर हाल में केवल अपनी जीत देखना चाहता है। यानी कोई मतदाता उससे खुश है या नाखुश, उसका समर्थक है या नहीं यह मायने नहीं रखता बल्कि हर हाल में उसका मत उसे चाहिए। यानी अगर वह दूसरे को मत देना चाहता है तो या तो मतदान केंद्र तक न जाए या अगर दे दिया तो उसे हर हाल में सबक सिखाना है ताकि भविष्य में कोई ऐसा न कर सके। पश्चिम बंगाल में 1970 के दशक में कांग्रेस ने इसकी शुरुआत की, बाद में वाम मोर्चा इसके विरुद्ध आवाज उठाकर सत्ता में आया लेकिन राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध हिंसा,  हत्या, दमन उत्पीड़न, उनकी संपत्तियों पर कब्जा, आगजनी आदि को सत्ता का संपूर्ण संरक्षण प्राप्त हुआ। ममता बनर्जी ने इसके विरुद्ध जबरदस्त संघर्ष किया, स्वयं अपने कार्यकर्ताओं के साथ वह भी सत्ता संरक्षित हिंसा का शिकार हुई। विडंबना देखिए कि सत्ता में आने के बाद ममता और तृणमूल वाम मोर्चा से ज्यादा खतरनाक तरीके से राजनीतिक हिंसा को आगे बढ़ा दिया। देश के सामने तृणमूल सत्ता संरक्षित हिंसा की भयानक घटनाएं 2018 पंचायत चुनाव के समय और उसके बाद सामने आए। जगह-जगह लूट, आगजनी, बलात्कार, हत्या की घटनाएं हुई तथा भारी संख्या में लोगों को अपने स्थान से दूर या राज्य से बाहर पलायन करना पड़ा। 2022 विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 1900 से ज्यादा हिंसा की घटनाएं दर्ज की। इनमें से लगभग ढाई दर्जन हत्या के मामले की जांच सीबीआई के जिम्मे है और मुकदमा चल रहा है।

2026 के विधानसभा चुनाव बिल्कुल भिन्न था। चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व सवा दो लाख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जवान तैनात किए और गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा किया कि ये चुनाव के बाद दो महीने तक तैनात रहेंगे। जितना संभव हुआ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण , चुनाव तक कार्य मुक्ति तथा उनकी जगह प्रदेश या बाहर से अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गई। इन सबके कारण सुरक्षा का माहौल बना और हर हाल में जीतने की लालसा वाले न आतंक का माहौल बना सके और न हिंसा कर सके। पिछले 6 दशक में बंगाल का पहला चुनाव था जिसमें कोई हत्या नहीं हुई और जो हिंसारहित था। किंतु तृणमूल कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में सत्ता के साथ ऐसे निहित स्वार्थी तत्व खड़े कर दिए हैं जो पराजय पचा नहीं सकते क्योंकि इससे उनका जीवन सीधे प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए अगर बंगाल की सड़कों पर तृणमूल के लोग टोल नाका बना वसूली कर रहे थे और एक दिन में सारे बंद हो गये तो उससे कितने लोगों की अवैध आय का अंत हो गया। ऐसे लोग उनके विरुद्ध प्रतिशोध लेने की हर संभव कोशिश करेंगे तो जिन्होंने पार्टी उम्मीदवारों को हराने में भूमिका निभाई। इसी तरह हर स्तर पर कट मनी और सिंडिकेट सत्ता का स्वाभाविक अंग बन चुका था। जो लोग इन सबसे प्रभावित हुए या जिनका इनसे संघर्ष हुआ उनके अंदर भी गुस्सा होगा। सामान्य प्रशासन, पुलिस प्रशासन सबका अति तृणमूलीकरण हो चुका है। तृणमूल से जुड़े किसी नेता के भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई का हिंसक विरोध और यहां तक कि केंद्रीय एजेंसियों पर हमले और खदेड़े जाने के दृश्य हम सबने देखे। जब उनकी नेत्री ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों ने मिलकर उन्हें हराया और भाजपा को जिताया तो इसका संदेश इन सबके बीच क्या गया है यह बताने की आवश्यकता नहीं। यह एक प्रकार से अपने लोगों को उकसाना है कि आप शक्ति प्रदर्शित करो और इस चुनाव परिणाम को स्वीकार मत करो। ध्ममता बनर्जी ने किसी बयान में नहीं कहा कि हमें हिंसा नहीं करनी है और हमारा विरोध लोकतांत्रिक तरीके से हो। इस तरह देखें तो निष्कर्ष है कि राजनीतिक हिंसा को पूरी तरह नियंत्रित करना बंगाल के लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि दंगाइयों अपराधी यो आदि के विरुद्ध कि तेजी से कारवाइयां हो रही है उनसे उम्मीद जगाती है कि राजनीतिक हिंसा का अंत होगा।

   –  अवधेश कुमार

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