लघु वृत्तचित्र (short documentary) ‘आओ बात करें ‘

न कोई कट, न रिटेक न एक्शन। बस साधारण -स्वाभाविक बातचीत और लो बन गई फिल्म।
ये कोई कहानी नहीं थी और न ही कोई योजना। बस मन में एक विचार उठा कि बच्चों को माननीय राज्यपाल डॉ सी वी आनंद बोस से मिलवाये। राजभवन से अनुमति भी मिल गई। बस फिर क्या था, पहुंच गए राजभवन अपने लाव लश्कर ( स्टिल व् विडिओग्राफर ) के साथ, दिन के 12 बजे। पहुंचे तो पता चला की कुछ कारण वश शूटिंग शाम को ही हो सकेगी या फिर दूसरी डेट ले लीजिये। हम थोड़ा असमंजस में थे कि इंतजार करने से बेहतर है दूसरी तारीख ले ले , किन्तु मेरी दोस्त प्रोफेसर वसुंधरा मिश्रा ने कहा कि – “डेट मत लो शूटिंग शाम को ही कर लो।” हमारे सिनेमैटोग्राफर भी इंतजार करने के लिए राजी हो गए।
शाम को हम लोगो को इंतजार नहीं करना पड़ा राज्यपाल महोदय समय से आ गए और आते ही सभी बच्चों से उनका परिचय पूंछा उन्हें चॉकलेट्स दी। उन चॉकलेटस का असर इतना गहरा हुआ कि मेरी पोती माशा जब भी अखबार या न्यूज में उनकी फोटो देखती तुरंत बोलती ! ” गवलनल अंकल।!” उन्होंने बच्चों से ढेर सारी बातें अपने ऑफिस में की और बाद में टेबल पर बच्चों के संग बैठ कर उन्हें कहानियों के जरिये ज्ञानप्रद शिक्षा भी दी यहाँ तक की बच्चों के संग बच्चे बन कर ट्विंकल -ट्विंकल लिटिल स्टार पोएम भी गाई। हम सभी ने उनके सहज – शांत , धैर्यपूर्ण व्यवहार को बहुत पसंद किया.
घर आकर जब हमने फुटेज देखे तो हमने महसूस किया कि इनपर काम किया जा सकता है ! उनकी कहानियां सुनाने की शैली, बच्चों को देश -विदेश के बड़े लेखकों के उद्धरण सुनाना और बच्चों को भी प्रेरित करना कि तुम भी कहानी सुनाओं और उनके द्वारा सुनाई गई कहानियों को ध्यान से सुनना।
ये देखकर हमें अपनी पुरानी शिक्षा -संस्कृति याद आ गई , जब गुरु किसी पेड़ के नीचे या खुले मैदान में शिक्षा देते थे उन्हें मौखिक रूप से विधिवत समझाते थे की सुना हुआ छात्रों के मन – मस्तिष्क पर अंकित हो जाता था। जबकि आज के अधिकतर स्कूलों में ये स्थिति है कि अध्यापक पढ़ाते तो जरूर है किन्तु रोबोटिक मैनर में। बच्चों को समझ में आया या नहीं ये उनकी समस्या नहीं है वरन अभिभावकों की है।
यही वजह है कि स्कूलों की बड़ी -बड़ी फ़ीस देने के बावजूद भी माता -पिता को उनके लिए ट्यूशन लगानी पड़ती है और बहुत बार स्कूल तथा ट्यूशन के बावजूद भी बच्चा अच्छे नंबरों से पास नहीं होता क्योंकि उसके शिक्षक या शिक्षिका कॉपी सही से चेक नहीं करते या फिर जल्दबाजी में गलत उत्तर और स्पेलिंग को भी सही का टिक लगा देते। कितने शिक्षक बड़ी शान से कहते है की मेरा और मेरे छात्रों का नाता सिर्फ और सिर्फ क्लास रूम तक है। जबकि शिक्षकों का दायित्व है बच्चों में ज्ञान के बीज रोपना, शिक्षा के प्रति रूचि जगाना और उन्हें एक सभ्य ,सुंस्कृत नागरिक बनाना।

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