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फाग और लोक संस्कृति: शब्दों का कुंभ

फाग और लोक संस्कृति की तान से गूँजा शिवना साहित्य समागम

शब्दों का कुंभ:  सीहोर में शिवना साहित्य समागम का भव्य आयोजन, देशभर के रचनाकारों का जमावड़ा

 

पहले दिन सिद्धपुर सभामंडप में उद्घाटन के साथ शुरू हुआ दो दिवसीय साहित्योत्सव;

 

तीन सभागारों में 12 वैचारिक सत्र, पुस्तक लोकार्पण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से महक उठी मालवा की धरा

 

सीहोर। साहित्य, संस्कृति और विमर्श की त्रिवेणी ‘शिवना साहित्य समागम 2026’ का शंखनाद शनिवार सुबह सीहोर की ऐतिहासिक धरती पर किया गया। साहित्य और होली का समागम भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत सुंदर रंगीन और जीवंत पक्ष है। होली का त्योहार सिर्फ रंगों का नहींबल्कि भावनाओं भाईचारे और सृजन का उत्सव है जिसे हिंदी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में बड़े ही अनूठे ढंग से पिरोया है। इंदौर-भोपाल बायपास स्थित क्रिसेंट रिसोर्ट एंड क्लब में आयोजित इस दो दिवसीय महोत्सव ने शहर को देश के साहित्यिक मानचित्र पर प्रमुखता से अंकित कर दिया। 28 फरवरी को सुबह 9:45 बजे सिद्धपुर सभामंडप में दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ इस महाकुंभ का शुभारंभ हुआ, जिसमें देशभर से जुटे सैकड़ों साहित्यकारों, पत्रकारों और सुधी पाठकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके अलावा ब्लू बर्ड स्कूल की अहम भूमिका रही, जिसमें विद्यार्थियों ने पूरे अनुशासन और समर्पण भाव से देश भर से साहित्यकारों का स्वागत और सम्मान किया। वहीं संचालन पंकज सुबीर ने किया।

 

उद्घाटन सत्र: परंपरा और आधुनिकता का विमर्श-उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जगतगुरु पंडित अजय पुरोहित ने की। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में साहित्य अकादमी के निदेशक विकास दवे, वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय, विधायक सुदेश राय, प्रिंस राठौर, श्रीमती नमिता राय और श्रीमती अरुणा राय मंचासीन रहे। सत्र का कुशल समन्वय डॉ. गरिमा संजय दुबे और स्मृति आदित्य ने किया। अतिथियों ने अपने संबोधन में कहा कि सीहोर जैसे ऐतिहासिक नगर में इस स्तर का आयोजन हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के संवर्धन में मील का पत्थर साबित होगा। उद्घाटन के पश्चात पूरा परिसर वैचारिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया।

 

प्रथम दिन के सत्र: विविध विषयों पर गहन मंथन, आज दिनभर तीन अलग-अलग सभागारों में समांतर सत्रों का दौर चला, जिनमें साहित्य के हर पहलू पर चर्चा की गई, सिद्धपुर सभामंडप वैचारिक विमर्श, धर्म और साहित्य: प्रथम सत्र में ‘धर्म और साहित्य का अंतर्संबंध’ विषय पर यतींद्र मिश्र और विकास दवे ने सारगर्भित विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य और धर्म दोनों ही मनुष्य को परिष्कृत करने का कार्य करते हैं। सिनेमा और साहित्य: दूसरे सत्र में अभिनेता यशपाल शर्मा और प्रतिभा सुमन शर्मा ने फिल्मों में साहित्य की घटती भूमिका और पटकथा लेखन की चुनौतियों पर बात की। स्वास्थ्य और जीवन: दोपहर के सत्र में डॉ. विजय सक्सेना और अखिलेश राय ने ‘कैसे स्वस्थ रहे कोई’ विषय पर महत्वपूर्ण टिप्स साझा किए। कविता की पाठशाला: शाम के सत्र में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने कविता के शिल्प और उसकी सामाजिक सरोकारिता पर प्रकाश डाला। थर्ड जेंडर संघर्ष एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील सत्र में महामंडलेश्वर संजना सखी, ममता नायक और पायल जान ने ‘थर्ड जेंडर के जीवन संघर्ष’ पर अपनी बात रखकर श्रोताओं को भावुक कर दिया।

 

सिपाही बहादुर सभागार सृजन और समाज

 

इस सभागार में शिखरों के वारिस, नई सदी की नई कविताऔर ‘नई सदी की नई कहानी’ जैसे विषयों पर चर्चा हुई। यहाँ लीलाधर मंडलोई, उर्मिला शिरीष, प्रज्ञा पाण्डेय और रेखा कस्तवार जैसे दिग्गजों ने वर्तमान कथा-साहित्य के बदलते स्वरूप पर अपनी राय रखी।

 

विशेष रूप से ‘पत्रकारिता की विश्वसनीयता’ पर आयोजित सत्र में अनुराग द्वारी, पंकज शुक्ला, ब्रजेश राजपूत और शैलेन्द्र पटेल ने मीडिया के सामने मौजूद चुनौतियों और ‘फेक न्यूज’ के दौर में पत्रकारिता के धर्म पर तीखी और सार्थक बहस की।

 

कुँवर चैनसिंह सभागार भविष्य और विमोचन

 

दोपहर में बच्चों के लिए समर्पित विशेष सत्र भविष्य से संवाद आयोजित हुआ, जिसका संचालन पंकज सुबीर ने किया। इसके उपरांत एक भव्य ‘पुस्तक लोकार्पण’ कार्यक्रम हुआ, जिसमें सुधा ओम ढींगरा, तेजेन्द्र शर्मा, यतींद्र मिश्र, और नीलिमा शर्मा सहित करीब 20 लेखकों की नवीन कृतियों का विमोचन डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी और यशपाल शर्मा की गरिमामयी उपस्थिति में किया गया।

 

सम्मान समारोह और भगोरिया की गूँज

 

शाम को आयोजित भव्य ‘अलंकरण समारोह’ समागम का मुख्य आकर्षण रहा। इसमें लीलाधर मंडलोई को उनकी आत्मकथा ‘जबसे आँख खुली है’ के लिए, प्रभात रंजन को उनके उपन्यास ‘क़िस्साग्राम’ के लिए तथा मनीष वैद्य को उनके कहानी संग्रह ‘वाँग छी’ के लिए अंतर्राष्ट्रीय शिवना सम्मान से नवाजा गया। साथ ही मुकेश नेमा को उनकी डायरी ‘इत्तू सी इरा’ के लिए, स्मृति आदित्य को उनकी डायरी ‘अब मैं बोलूँगी’ के लिए तथा प्रवीण कक्कड़ को उनकी किताब ‘दण्ड से न्याय तक’ के लिए शिवना कृति सम्मान प्रदान किया गया। रश्मि कुलश्रेष्ठ को उनके उपन्यास ‘शेष रहेगा प्रेम’ के लिए तथा शुभ्रा ओझा को उनके कहानी संग्रह ‘आख़िरी चाय’ के लिए शिवना नवलेखन पुरस्कार प्रदान किया गया। यह सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी, श्री संतोष चौबे, डॉ. प्रेम जनमेजय, श्री यतीन्द्र मिश्र, सुप्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता श्री यशपाल शर्मा तथा क्रिसेंट ग्रुप के चेयरमैन श्री अखिलेश राय ने प्रदान किये। स्वागत भाषण वरिष्ठ लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने तथा आभार प्रदर्शन वामा की अध्यक्ष ज्योति जैन ने व्यक्त किया। सम्मान समारोह के पश्चात रात्रि 9 बजे से मालवा की प्रसिद्ध लोक संस्कृति भगोरिया नृत्य की प्रस्तुति दी गयी, जिसमें स्थानीय कलाकारों द्वारा ढोल की थाप पर लोक जीवन के रंगों को बिखेरा गया।

 

रेडियो कर्मवीर की गूँज- आयोजन को वैश्विक मंच देने के लिए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की ‘रेडियो कर्मवीर 90.0 एफएम की टीम सीहोर में डेरा डाले हुए रही। टीम द्वारा लगातार लाइव बाइट्स और साक्षात्कारों का रिकॉर्डिंग की गई, जिससे यह आयोजन रेडियो के माध्यम से घर-घर पहुँचा।

 

आयोजन समिति का प्रयास-इस सफल आयोजन के पीछे यतींद्र मिश्र, यशपाल शर्मा, अखिलेश राय, श्रीमती मनीषा कुलश्रेष्ठ और श्रीमती ज्योति जैन की मेहनत साफ नजर आई। परामर्श समिति के लोकेन्द्र मेवाड़ा, कैलाश अग्रवाल और पंकज सुबीर सहित समूची टीम अतिथियों के सत्कार और सत्रों के सुचारू संचालन में जुटी रही। सीहोर के नागरिक भी इस आयोजन को लेकर उत्साहित रहे और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं साहित्य के इस ‘महाकुंभ’ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

दूसरे दिन मालवा के फाग उत्सव के साथ हुआ समापन

1 मार्च 2026 मालवा की ऐतिहासिक धरती सीहोर में दो दिनों तक चले शब्दों के महाकुंभ ‘सीहोर लिटरेचर फेस्टिवल’ का रविवार को अत्यंत गरिमामय और सांस्कृतिक उल्लास के साथ समापन हुआ। शिवना प्रकाशन द्वारा आयोजित इस महोत्सव ने न केवल साहित्य की गंभीर विधाओं पर चर्चा की, बल्कि लोक कला और उत्सव के रंगों से श्रोताओं का मन मोह लिया।

 

लोक संस्कृति का संगम: प्रहलाद प्रजापति की फाग प्रस्तुति

 

कार्यक्रम के अंतिम सत्र की जानकारी देते हुए शिवना प्रकाशन के पंकज सुबीर ने बताया कि समापन समारोह ‘सिद्धपुर सभामंडप’ में आयोजित किया गया। इस सत्र का मुख्य आकर्षण सुप्रसिद्ध कलाकार प्रहलाद प्रजापति का फाग गायन रहा। प्रजापति ने जब मालवी और बुंदेली लोक धुनों पर फाग गीतों की प्रस्तुति दी, तो पूरा पांडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। गीतों के साथ ही ‘फूलों की होली’ का आयोजन किया गया, जहाँ साहित्यकारों और प्रबुद्ध नागरिकों ने एक-दूसरे पर फूलों की वर्षा कर प्रेम और सौहार्द का संदेश दिया।

 

तीन सभागारों में चला वैचारिक मंथन

 

महोत्सव के दूसरे दिन रविवार को सुबह से ही तीन अलग-अलग सभागारों – सिद्धपुर सभामंडप, सिपाही बहादुर सभागार और कुँवर चैनसिंह सभागार में समानांतर सत्रों का आयोजन हुआ।

 

साहित्यिक पाठशाला और विमर्श: दिन की शुरुआत ‘उपन्यास की पाठशाला’ और ‘क्या है व्यंग्य विधा का भविष्य?’ जैसे सत्रों से हुई। वक्ताओं ने उभरते लेखकों को लेखन की बारीकियों से अवगत कराया। वहीं, ‘कलाओं की विरासत’ और ‘कथेतर साहित्य की बढ़ती लोकप्रियता’ पर भी विद्वानों ने अपने विचार रखे।

 

मीडिया और समाज: “2 डिबेट या न्यूज़… क्या चाहता है दर्शक?” विषय पर हुई चर्चा में वर्तमान मीडिया परिदृश्य और दर्शकों की बदलती पसंद पर तीखे सवाल-जवाब हुए।

 

क्षेत्रीय अस्मिता: ‘मालवा-निमाड़ के कथाकारों की उपेक्षा’ सत्र में स्थानीय साहित्यकारों को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। साथ ही, ‘पुलिस सेवा में रहते हुए साहित्य सृजन’ जैसे अनूठे सत्र ने यह दिखाया कि प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच भी संवेदनाएँ कैसे जीवित रहती हैं।

काव्य और महिला विमर्श: दोपहर के सत्रों में ‘कविता पाठ’ और ‘वामा इंदौर- आधी आबादी की आवाज़’ जैसे सत्रों ने समाज के विभिन्न पहलुओं को छुआ।

 

आयोजन समिति का सक्रिय योगदान

 

इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में आयोजन समिति के सदस्यों यतीन्द्र मिश्र, यशपाल शर्मा, अखिलेश राय, मनीषा कुलश्रेष्ठ और ज्योति जैन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। समापन सत्र का कुशल संचालन विनय उपाध्याय द्वारा किया गया।

आभार प्रदर्शन और विदाई

कार्यक्रम के अंत में शशिकांत यादव ने विधिवत आभार प्रदर्शन किया। उन्होंने प्रशासन, स्थानीय सहयोगियों, देशभर से आए वक्ताओं और सीहोर की साहित्यप्रेमी जनता का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि यह फेस्टिवल केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार है जो आने वाले समय में सीहोर को सांस्कृतिक मानचित्र पर और ऊँचा स्थान दिलाएगा।

 

शाम 5:00 बजे चाय और अल्पाहार के साथ इस दो दिवसीय उत्सव का विसर्जन हुआ। विदाई की बेला में हर किसी की आँखों में अगले वर्ष फिर मिलने की उम्मीद और शब्दों की नई ऊर्जा साफ दिखाई दे रही थी।

आकाश माथुर

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