” मेरी माँ नहीं गाती थी “

मेरी मां नही गाती थी
न लोरी न गीत
रहीम, रसखान, मीरा की प्रीत
जब देती थी थपकी सुलाने
लग जाती थी गम को भुलाने
आंखों में होती अधूरे कामो की पीर
तरकशी तानो से रिसता हुआ नीर
घर के अभेदी चक्रव्यूह को तोड़ नही पाती
घुट कर रह जाती
औरजब टूट जाती थी
आंसुओं के सैलाब में डूब जाती थी
छिपा लेती थी मेरे मासूम चेहरे को अपने चेहरे से
दृढ़ता से लड़ती थी लगे हुए पहरे से
मेरी मां इस तरह मेरे सुनहरे भविष्य को बुनती थी
बीमारियों को दर किनार कर मेरी खातिर जीती थी ।।
-शकुन त्रिवेदी
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