पुस्तक समीक्षा—

पुस्तक: मेरे गीतों का संसार
लेखिका: डॉ. आशा शर्मा
प्रकाशक: श्री दीप प्रकाशन, गोरखपुर
लेखिका परिचय—-
डॉ. आशा शर्मा जी का पैतृक गाँव जहदा, निचलौल, गोरखपुर (वर्तमान महाराजगंज जनपद) है।
पिता श्री सहतू शर्मा एवं माता श्रीमती सेमरिया देवी की लाड़ली पुत्री का जन्म 2 नवम्बर -1977 सेमरहिया, कुशीनगर में हुआ।
पिता सतहु शर्मा जी इंडियन कोल माईन्स हज़ारी बाग़ बिहार
वर्तमान झारखण्ड मे इंचार्ज पद पद पर कार्यरत थे डॉ आशा शर्मा से बड़ी एक बहन एवं एक छोटा
भाई है पिता कोल इंडिया माईन्स से 2008 मे सेवा निवृत हो गये और परिवार अपने मूल जनपद माटी को लौट आया!
डॉ आशा शर्मा का जन्म सिर्फ
कुशीनगर हुआ लालन पालन
पोषण हज़ारी बाग़ झारखण्ड मे
ही हुआ वही से शिक्षा का शुभारम्भ हुआ!
मैट्रिकुलेशन सैदा डी हज़ारी बाग से उत्तीर्ण किया एवं इंटरमीडिएट की शिक्षा वुमेन्स कॉलेज, राँची (झारखण्ड), स्नातक की शिक्षा विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (झारखण्ड) एवं स्नातकोत्तर की शिक्षा पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर से पूर्ण हुई।
वर्ष 2009 से डॉ. आशा शर्मा जी प्राथमिक विद्यालय, खड्डा में सहायक अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं।
डॉ आशा शर्मा कि रचनाएँ स्थानीय, प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय समाचार-पत्रों तथा पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होती रहती हैं।
डॉ आशा शर्मा द्वारा अनेकों पुस्तकें लिखी गई हैं।
14 मार्च 2026 को डॉ आशा शर्मा को *विद्या वाचस्पति* की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है।
पुस्तक का अवलोकन—
मुझे डॉ. आशा शर्मा जी की कृति *”मेरे गीतों का संसार”* पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। पुस्तक को आद्योपांत पढ़ने के बाद स्पष्ट आभास हुआ कि यह काव्य-संग्रह स्वयं लेखिका के जीवन के पल-प्रहर की अनुभूति है।
डॉ. आशा जी के संस्कार अति पिछड़े पूर्वांचल के ग्रामीण अंचल से शुरू होकर राँची-हजारीबाग के आदिवासी-बहुल क्षेत्र से होते हुए पुनः अपनी माटी की ख़ासियत और ख़ूबसूरती में समाहित हो गए हैं। वे माटी के कर्ज़-फ़र्ज़ के रूप में अपने कर्तव्य-दायित्व बोध से परिपूर्ण, माटी की पीढ़ियों को शिक्षित करने के गुरुतर दायित्व का निर्वहन कर रही हैं, जो निश्चय ही अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय है।
कृति की विषय-वस्तु—
“मेरे गीतों का संसार” काव्य-संग्रह *’मानव धर्म निभाना होगा’* से शुभारम्भ होकर *’मैं तो झूम रही हूँ’* तक कुल अट्ठावन विभिन्न शीर्षकों में पिरोया गया है। सभी अट्ठावन रचनाएँ अपनी जगह पर कवयित्री के भावों से समय और समाज को सशक्त संदेश देने की सकारात्मक दृष्टि, दिशा और दृष्टिकोण का
सामाजिक-सामयिक आवाहन करती हैं।
#आडम्बर और स्वेच्छाचार,
कर गए इसे कुत्सित कालुषित धर्म हो रहा ‘अ’ का बंदी, फैल रही कु-शाखा तिमिरावृत।।
इस अंध भँवर से निकाल जग को, शुभ सुप्रकाश दिखलाना होगा।
विकृत हुए मानव चित्रों को,
फिर सुंदर स्वस्थ बनाना होगा, मानव धर्म निभाना होगा।#
मानव धर्म निभाना होगा’ के सार्थक पहल से लेकर ‘मैं झूम रही हूँ’ तक डॉ. आशा शर्मा ने विभिन्न सामयिक-सामाजिक समस्याओं को बड़े सुंदर ढंग से मनोवैज्ञानिक यथार्थ और साहित्यिक समरसता के समन्वय से सराबोर, निर्विकार-निश्छल भावाभिव्यक्ति से प्रभावी एवं आकर्षक बनाया है, जो इस कृति की विशेषता है।
हवा चली मस्ती में झूम के
बहती मेरे मुखड़े को चूम के
स्नेह है पावन चुम्बन की तरह,
मैं तो झूम रही हूँ पागल पवन की तरह।
साहित्यिक विवेचना—
निर्विवाद रूप से डॉ. आशा शर्मा जी की कृति “मेरे गीतों का संसार” एक पावन-पवित्र, सुगंधित पवन-झोंके की तरह है, जो हृदय को स्पर्श करती हुई मानवीय मूल्यों का शंखनाद करती है, मानवीय चेतना को जागृत करती है और उसे जन्म-जीवन का एहसास तथा उसके दायित्व-कर्तव्य का बोध कराती है।
निःसंदेह यह कृति समय-समाज के लिए सारगर्भित संदेश देती है और हिंदी साहित्य की कालजयी कृतियों में परिभाषित होने की प्रमाणिकता रखती है।
डॉ. आशा जी की सभी रचनाएँ भावनाओं की अभिव्यक्ति एवं साहित्यिक वंदन-अभिनंदन हैं, जिनमें कोमल नारी-मन की वेदना-संवेदना सन्निहित है। अतः यहाँ छंदों की विवेचना गौण हो जाती है; केवल अभिव्यक्ति के भावों का मूल्यांकन ही कृति को सर्वोच्च शिखर पर प्रासंगिक-प्रामाणिक बनाने में पूर्ण सक्षम है। यही सत्यार्थ इस कृति को स्वच्छता, स्वच्छंदता सहित साहित्यिक काव्य-रसों का रसपान कराता है।
प्रकाशन–
श्री दीप प्रकाशन, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक निश्चय ही उत्कृष्ट प्रकाशन श्रेणी में आती है। सुधार की गुंजाइश सदैव बेहतर से बेहतरीन और उत्तम से अति-उत्तम, सर्वोत्तम तक जाने की प्रक्रिया ही समाज में किसी विधा-विधान के होने की प्रामाणिकता है, जिसे श्री दीप प्रकाशन ने समझा है और प्रकाशन में अपने दायित्वों का उत्कृष्ट निर्वहन करने की कोशिश की है, जो प्रशंसनीय है!
निष्कर्ष —
आपके भावों को साहित्यिक परिमार्जन के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ — वही आत्मा, अधिक प्रभावी प्रवाह में:
डॉ. आशा शर्मा: द्वि-संस्कृति की साहित्यिक साधिका—-
डॉ. आशा शर्मा की पृष्ठभूमि ग्रामीण और शहरी — दोनों संस्कारों का संगम है। उनका पैतृक गाँव और जन्म कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में है, जबकि शिक्षा और परवरिश हजारीबाग, झारखण्ड में हुई। इन दोनों संस्कृतियों के संस्कारों का प्रभाव उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अत्यंत स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
उनकी दूसरी विशेषता यह है कि उनके कृतित्व पर उनके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
शिक्षा का अंतर्द्वंद्व भी उनकी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। डॉ. आशा शर्मा जिस दौर से आती हैं, वह दौर कन्या शिक्षा के प्रति सामाजिक उदासीनता का दौर था। किन्तु समझदार माता-पिता द्वारा दी गई पारिवारिक शिक्षा और संस्कार का प्रभाव उनके व्यक्तित्व से लेकर कृतित्व तक में समाहित है।
यही विशेषता उनकी कृति *#मेरे गीत मेरे स्वर* की आत्मा है — यह अनुभूति की अवनि से उठकर भावाभिव्यक्ति के आकाश को स्पर्श करने के लिए संकल्पित कृति है।
निश्चिंत रूप से यह परिवेश और परिस्थितियों को चुनौती देती, आडम्बर, दिखावे और छद्म की चंचलता को तोड़ने की छटपटाहट की अभिव्यक्ति है।
डॉ. आशा शर्मा अपनी अभिव्यक्तियों में तीव्रता, तीक्ष्णता, मधुरता और वर्तमान-अतीत के सम्मिश्रण का परिमार्जन लेकर आती हैं, जो उनकी कृतियों में अपेक्षित है — जिसके लिए *#मेरे गीत मेरे स्वर* कालजयी कृति का आधार बन सकने की सम्पूर्ण क्षमता से परिपूर्ण है।
यह अद्भुत, अविस्मरणीय साहित्यिक अनुष्ठान की अधिष्ठात्री का काल, समय और समाज द्वारा स्वागत-अभिनंदन है!!
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