Thursday , October 15 2026

कालजयी व्यक्तित्व

अनंत प्रभा प्रवाह नव प्रभात

-डॉ विद्या निवास मिश्र जी —

कलजयी व्यक्तित्व —-

 

समय गतिमान है, अनंत प्रवाह है समय सबके लिए निरपेक्ष है, किसी के साथ कोई भेद-भाव नहीं रखता।

 

#समय किसी का मित्र नहीं, शत्रु नहीं,_सबके लिए समान, बस चलता है अविराम।_#

 

समय को काल का पर्याय भी स्वीकार किया जाता है। समय, काल, वक्त, टाइम — संबोधन जो भी दें लें, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चर-अचर के लिए समानता का भाव लिए गतिमान रहता है, रुकता नहीं।

 

#टिक-टिक करता नहीं, यह तो बहता है,रुका जो एक पल, फिर कभी न मिलता है।#

 

समय-काल को ईश्वरीय विधान में ईश्वर के ही स्वरूप में व्याख्यायित किया जाता है। जिस प्रकार परमात्मा, प्रकृति, प्राणी के ब्रह्माण्ड में सभी चैतन्य सत्ता का समय-काल निर्धारित है, किन्तु स्वयं समय-काल असीमित, अनंत है।

 

#और न तो दिखता है, न मरता है,न जलता है, न कटता है।#

 

#न दिखे, न जले, न कटे, न मरे,_फिर भी सबके माथे पर समय ही लिखे।_#

 

अर्थात समय का सीधा सम्बन्ध ईश्वर से है, आत्मा से है, जो अदृश्य होते हुए भी निरपेक्ष, निर्विकार, निर्विवाद, बिना भेद-भाव के सृष्टि-युग में अविरल-अविराम विद्यमान रहते हुए, समय-काल के अंतर्मन से अपनी अनुभूति कराते रहते हैं।

 

काल-समय के निरंतर प्रवाह में, प्राणी की काया में आत्म-सत्ता की चेतना रूप में विद्यमान ईश्वर, प्राणी के प्रारब्ध के अनुसार उसे जन्म-जीवन में स्थिति-परिस्थिति प्रदान करता है।

 

शेष प्राणी पर छोड़ देता है कि उसे दिए गए समय-काल एवं प्रारब्ध परिवेश का —

 

#सदुपयोग सार्थक सकारात्मक करे,_या भोग-विलास में ही जीवन धरे।_#

 

अपनी उपस्थिति से काल-समय को परिभाषित करता है, या प्राप्त समय-काल में प्राणी, प्राण की चैतन्य सत्ता को भोग-विलास का माध्यम एवं प्रारब्ध मानता है। यह निर्भर करता है प्राणी की सोच-समझ, दायित्व, कर्तव्य-बोध पर।

 

ब्रह्माण्ड की सृष्टि के विभिन्न काल-खण्डों में, परमात्मा स्वयं अपने आत्मीय सत्य के साथ काया ग्रहण करता है। अंधकार एवं उन्माद की दुष्ट शक्ति से आहत युग को, समय-काल की पुकार के अनुसार —

 

#दिशा देता, दृष्टि देता, नया दृष्टिकोण देता,

समय को ही नई व्याख्या से गौरवान्वित करता।#

 

सनातन में नारायण के अवतारों का सत्यार्थ यही है!

 

ब्रह्माण्ड में युग-सृष्टि संरचना से लेकर उसकी मान्यताओं, सिद्धांतों की रक्षा करने के लिए स्वयं विभिन्न स्वरूपों का धारण करता है। यही सत्य सभी समाज, धर्म का मर्म सत्य है।

 

कोई महावीर बन जागा, कोई बुद्ध कहलाया,कोई नानक, कोई पैगम्बर, कोई यीशु बन आया।

 

भगवान महावीर, सिद्धार्थ से बुद्ध, गुरु नानक देव जी, तो हज़रत मोहम्मद पैगम्बर, प्रभु यीशु ने मानव काया धारण कर, समय, समाज, युग को नई चेतना-जागृति का सन्देश देकर, प्राणी के कल्याणार्थ अपने लिए निर्धारित समय-काल का सदुपयोग किया!!

 

सृष्टि की निरंतरता में विभूतियों का अवतरण-

 

#सृष्टि चलती, काल हँसता, धरा नित नव साज सजाती,बीच-बीच में कुछ विभूतियाँ, बन कर दीपक आ जातीं।!#

 

सृष्टि की निरंतरता में ऐसी ही कुछ विभूतियाँ जन्म लेती हैं, जो साधारण जीवन से उठकर असाधारण कर्म करते हुए अविस्मरणीय उपलब्धियों को प्राप्त कर नए अंदाज़, नए आयाम और ऊँचाई के

मानदंड स्थापित करती हैं।

 

#साधारण कुल में जन्म ले, असाधारण कर दिखलाते,

मिट्टी को भी छू कर वे,

सोना बना जाते।#

 

जन्म –

 

जन्म-जीवन की इसी प्रक्रिया-परम्परा की कड़ी में गोरखपुर जनपद के ब्रह्मपुर विकास खण्ड, चौरी-चौरा तहसील के पकड़डीहा गाँव में पं. प्रसिद्ध नारायण मिश्र एवं श्रीमती गौरी देवी के घर 28 जनवरी, 1926 को एक अद्भुत बालक के रूप में जन्म लिया जिसे माता पिता ने विद्या निवास नाम दिया

 

#पकड़डीहा की पावन धरा, धन्य हुई उस भोर,गौरी-प्रसिद्ध के आँगन में, ज्ञान का बिखरा छोर।#

 

जिसे समय और समाज ने उसकी असाधारण उपलब्धियों के कारण जाना-पहचाना।

 

#वाणी में वेद, लेखनी में गंगा-धार,हिन्दी की छितवन में महका, संस्कृत का श्रृंगार।#

 

ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे पूर्वांचल के गौरव, उत्तर प्रदेश की शान, भारत भूषण, शब्द-ऋषि, हिंदी का अभिमान डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी।

 

#भ्रमरानन्द बन गुन-गुनाए, साहित्य का मधु-गान

राम का मुकुट भीगता देखा, किया हृदय से मान।#

 

 

शिक्षा-दीक्षा:-

 

गोरखपुर एवं वाराणसी में शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से वर्ष 1960-61 में ‘पाणिनीयव्याकरण की विश्लेषण पद्धति’* विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित की।

 

अमेरिका के #बर्कले विश्वविद्यालय#में शोध कार्य किया तथा 1967-68 में #वाशिंगटन विश्वविद्यालय# में अध्येता रहे। #कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय #में हिन्दी साहित्य एवं तुलनात्मक भाषा विज्ञान का अध्यापन किया।

 

मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के सूचना विभागों तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन में लगभग दस वर्ष सेवा के पश्चात वे अध्यापन क्षेत्र में आए।

 

1968 से 1977 तक सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्यापक रहे, बाद में इसी विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।भाषा विज्ञान एवं आधुनिक भाषा विज्ञान के आचार्य एवं अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।

 

राष्ट्र ने उनकी साहित्यिक सेवाओं को सम्मान देते हुए उन्हें राज्य सभा सांसद मनोनीत किया।

वे भारतीय ज्ञानपीठ के न्यासी बोर्ड के सदस्य और मूर्ति देवी पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष रहे।

 

स्वयं को वे #भ्रमरानन्द# कहते थे और छद्म नाम से भी प्रभूत लेखन किया।

 

प्रमुख रचनाएँ-

 

हिन्दी और अंग्रेज़ी में दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।

 

प्रमुख ललित निबन्ध संग्रह:

 

छितवन की छाँह (1953), हल्दी-दूब (1955), तुम चंदन हम पानी (1957), आंगन का पंछी बंजारा मन (1963), मैंने सिल पहुँचाई (1966), बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं (1972), मेरे राम का मुकुट भीग रहा है (1974), परम्परा बंधन नहीं (1976), कँटीले तारों के आर-पार (1976), लागो रंग हरो (1985), फागुन दुइ रे दिना (1994), कदम की फूली डाल (1996) आदि।

 

अन्य प्रमुख ग्रन्थ:-

महाभारत का काव्यार्थ, भारतीय भाषादर्शन की पीठिका, हिन्दी की शब्द-सम्पदा, गांधी का करुण रस, रहिमन पानी राखिए, राधा-माधव रंग रँगी, लोक और लोक का स्वर आदि।

 

पुरस्कार एवं सम्मान

 

1- पद्मश्री – 1988

2- मूर्ति देवी पुरस्कार – 1989

3- शंकर सम्मान (के.के. बिड़ला फाउंडेशन)

4- विश्व भारती सम्मान – 1996

5- साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता – 1996

6- पद्मभूषण – 1999

7-मंगलाप्रसाद पारितोषिक – 2000

8- हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार

 

निर्वाण —

 

काल की अटल है जन्म-मृत्यु का नियम-सिद्धान्त अटल सत्य है, जो कोख से जन्मा है, उसे एक न एक दिन अवश्य जाना है — चाहे स्वयं ईश्वर ही पृथ्वी पर अवतरित हुए हों। सनातन ही नहीं, प्रत्येक धर्म की मान्यता, सिद्धान्त और सत्य यही है। संसार की कोई भी मान्यता हो, जन्म हुआ तो निर्धारित समय-काल के बाद काल के गाल अर्थात समय की धारा के अंतर्मन में समाहित होना निश्चित है।

 

डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी भी काल-समय की नित्य-निरंतरता एवं आत्मा की अनंत कर्मानुसार यात्रा के इस यथार्थ से विलग नहीं थे। प्रत्येक प्राणी को इस सत्य का सामना करना ही पड़ता है।

 

ब्रह्माण्ड का कोई भी तत्त्व, चाहे प्रकृति से सम्बन्धित पेड़-पौधे, लता-गुल्म हों या मनुष्य एवं अन्य जीव — सभी इसी नियम से बंधे हैं।

 

पं. डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी 14 फरवरी 2005 को आजमगढ़ से एक साहित्यिक कार्यक्रम से लौट रहे थे।

अचानक उनकी कार बड़हलगंज के सरयू नदी पुल से लगभग 15-20 किलोमीटर दूर आजमगढ़-देवरिया मार्ग पर सड़क के एक मोड़ से टकरा गई, जहाँ डॉ. विद्यानिवास जी ने अंतिम श्वास ली।

मोबाइल का युग आ चुका था, मिनटों में इस असहनीय, हृदय-विदारक घटना से पूरे पूर्वांचल में शोक की लहर दौड़ गई।

 

उस दौर में मेरी नियुक्ति भारतीय जीवन बीमा निगम,वाराणसी की मंडुआडीह शाखा में थी। विद्वत शिरोमणि डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी के निर्वाण के ठीक

95वें दिन मेरी नियुक्ति गोरखपुर मंडल की घोसी शाखा में शाखा प्रबन्धक पद पर हुई।

 

अक्सर मैं उस स्थान पर जाता था, जहाँ विद्या-बृहस्पति डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी ने निर्वाण प्राप्त किया था, और जब भी उस स्थान की माटी को मस्तक पर लगाता, तो आत्मा से बरबस आवाज आती — जीवन धन्य हुआ–

 

ऐसे अनेकों अवसर मेरे सत्कर्मों से घोषी के दो वर्षों के प्रवास के दौरान प्राप्त हुए।

 

#जन्म-मृत्यु दो द्वार, एक ही आँगन के,आया जो जग में, जाएगा क्षण में#

 

#तन मिटता है, शब्द अमर हो जाते,विद्यानिवास जैसे संत न कभी जाते#

 

डॉ बीरभद्र मिश्र जी के अंतरंग  मित्र —

बीरभद्र मिश्र मूल रूप से देवरिया जनपद के रोहिनीया पिपरा के निवासी थे मुर्दान्य विद्वान बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं वाराणसी विद्वत परिषद मे सर्वमान्य सम्मानित विद्वान के साथ साथ रुद्रांश संकट मोचन हनुमान मंदिर के महंथ थे!

वैसे मिश्र जी जिस गाँव रोहिनीया पिपरा मिश्र के मूल निवासी थे वह देवरिया जनपद मे विद्वत ब्राह्मणो का सम्मानित गांव हैजहाँ से प्रत्येक क्षेत्र में देश को गौरवान्वित करने वाली प्रतिभाओ ने जन्म लिया इसी गाँव के निवासी वासुदेव मिश्र भारत के प्रथम ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने संस्कृत भाषा माध्यम एवं विषय के साथ भारतीय संघ लोक सेवा आयोग कि परीक्षा मे सम्मानित स्थान प्राप्त किया और वर्तमान समय में महाराष्ट्र मे उच्चतम पुलिस अधिकारी पद से सेवा निवृत होने के बाद निवास कर रहे है!

स्वर्गीय वीर भद्र मिश्र जी एवं डॉ विद्यानिवास मिश्र के निकतम एवं

आत्मीय सम्बन्ध थे!

2-

स्वर्गीय मदन मोहन मणि त्रिपाठी मूल रूप से उद्धव पुर देवरिया बैताल पुर कस्बे के निकट के मूल निवासी एवं सम्पूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियर थे साथ ही साथ सेंट्रल सैनिक स्कूल घोड़ाघाल के महत्वपूर्ण समिति के सम्मानित सदस्य रहे स्वर्गीय विद्या निवास मिश्र जी के निकटतम मेरी जानकारी के अनुसार थे!

3-

डॉ परमहंस मिश्र मूल रूप से देवरिया जनपद के रेवली भेवली मूल निवासी थे उनका गांव सरजू नदी के इस पार देवरिया जनपद में आता है दूसरी तरफ तुरती पार

बलिया जनपद का हिस्सा है!

डॉ परमहंस मिश्र भारतीय जीवन बीमा निगम में बिभिन्न पदों पर वाराणसी में पदास्थ्यपित रहे बहुमुखी प्रतिभा के सम्पन्न डॉ परमहंस मिश्र जी परिश्रमी, चुनौतियों से जूझने वाले और नेतृत्व क्षमताओ से परिपूर्ण व्यक्तित्व कि पूर्णता संपूर्णता के पराक्रम पुरुषार्थ थे डॉ परमहंस मिश्र ने अपने परिश्रम, नेतृत्व क्षमता एवं निष्ठा लगन से भारतीय जीवन बीमा निगम के

उच्च पदों को सुशोभित ही नहीं किया बल्कि निरपेक्ष रहते हुए बिना भेद भाव पक्षपात के उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम में बहुत लोगो को उनकी आकांक्षाओ के शिकर पर स्थापित किया उनकी कार्य शैली अनुकरणीय एवं अतुलनीय थी सेवा निवृत होने के बाद लखनऊ

में निवास करते है!

भी डॉ विद्या निवास मिश्र के करीबीयो में डॉ परमहंस मिश्र थी एक अमिट हस्ताक्षर थे!

 

स्वर्गीय डॉ बीरभद्र मिश्र, मदन मोहन मणि एवं डॉ परमहंस मिश्र जी जैसे स्वंय में आदर्श प्रेरक व्यक्तित्व स्वर्गीय डॉ विद्यानिवास जी के सामाजिक साम्बन्धो होने का बहुत स्पष्ट अर्थ है कि डॉ विद्या निवास मिश्र जी पूर्वांचल गोरखपुर जैसे आर्थिक एवं औद्योगिक रूप से पिछड़े जनपद मे जन्मे पले बढ़े और बाल्य काल से ही बिभिन्न चुनौतियों संघर्षो में तप कर निखरे व्यक्तित्व थे जिन्होंने पूरे जीवन काल में अपने

ज्ञान तप से भारतीयता एवं भारतीय समाज को शिक्षित सक्षम सबल सम्मानित आत्म निर्भर बनाने का कठिन सकल्प लेकर जीवन के अंतिम साँसो तक उसकी पूर्णता का प्रयास करते रहे!

डॉ विद्या निवास जन्म जीवन कि उस अनंत परम्परा के मानव पुरुष पुरुषार्थ जिसे सनातन के अवतारों कि अवधारणा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है उसकी अवधारणा पर ही जीवन मूल्यों कि अचार संघीता आचरण का निर्धारण किया गया है!

 

ज़ब भी कोई मनवा जातक के रूप में जन्म लेता है उसकी मुठ्ठी बंद होती है जिसका स्पष्ट अर्थ एवं सदेश है कि ईश्वर, परमात्मा ने सदकर्मो कि काया प्रदान किया है और आत्म सत्य अंश में स्वंय विराजमान होकर ब्रह्माण्ड में इस उद्देश्य से भेजा है कि प्राप्त जीवन काल समय में ईश्वरीय

अवतरण अवधारणा के आचरण से युग को नव जागृत चेतना का वाहक संवाहक बन सकारात्मक सार्थक परिवर्तन का आवाहन, शंखनाद ही नहीं बल्कि जीवेत जाग्रत समाज में ईश्वरीय चेतना के सत्य का संचार करेगा ताकि ज़ब वह जीवन काल समय कि पूर्णता के बाद संसार छोड़ कर जाए तब उसके खुले हाथो मे युग समाज अपने अतीत के गौरव वर्तमान के अभिमान और भविष्य के स्वर्णिम निर्माण कि नियति नीति नियंता के सत्यार्थ को साक्षात् प्राप्त करता उसकी ऊर्जा से ओत प्रोत होगा!

 

डॉ विद्या निवास मिश्र जी जन्म जीवन के इसी सत्यार्थ कि युग चेतना के पराक्रम कालजयी पुरुष थे!

 

निष्कर्षतः

डॉ विद्या निवास मिश्र जी के विषय में अनेको बार कुछ लिखने का साहस जुटाता रहा सदैव नेत्र नम एवं कलम निः शब्द मुक आश्चर्य से स्वंय को स्वर्गीय डॉ विद्या निवास जी के व्यक्तित्व कि आभा के किसी किरण में खोजने का प्रयास कर निरुत्तर लज्जित हो बरबस बोल उठती डॉ विद्या निवास जी आदर्श,अनुकरणीय, अतुलनीय,निश्चल, अविरल, निर्मल गंगा कि पावन धारा धरा का धन्य धैर्य ज्ञान के सागर गौरव कि ऊँचाई आकाश तो निर्विवाद, निर्विकर,निर्विरोध युग काल समय में ईश्वरीय अवतरण अवधारणा के सत्यार्थ थे जो विरले पृथ्वी पर समाज समय राष्ट्र का नव इतिहास अपने वर्तमान से

रच देते है!

मिश्र जी का निबन्ध-संसार बहुआयामी है — प्रकृति, लोकतत्व, बौद्धिकता, सृजनात्मकता, कल्पनाशीलता, काव्यात्मकता और भाषा की उर्वर सृजनात्मकता का अद्भुत अंतर्ग्रथन। उनके ललित निबन्धों की महक साहित्य-जगत में सदैव बनी रहेगी।

 

नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश!!

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