जयदीप चट्टोपाध्याय, वन्देमातरम गीत के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की पांचवीं पीढ़ी
के हैंऔर एक समर्थ बांग्ला कवि हैं. ये उनकी ताजा-तरीन कविता है.

— जयदीप चट्टोपाध्याय
अन्तर्मन में आओ माँ

शरद आते हीप्रकृति स्वयं सँवारने लगती है
पूजा का आसन—
शिउली की गंध में,
काश के फूलों की डोलती लहरों में,
नीले आकाश की अनंत गहराइयों में।
कैलाश छोड़
माँ उतर आती हैं धरती पर,
और हम—
वर्ष भर जिसकी राह निहारते हैं,
फिर पा लेते हैं
अपने विश्वास की लौ,
प्रार्थना की वह पावन धुन।
माँ आती हैं
असुर-विनाशिनी बनकर।
पर माँ,
बाहर के असुरों से पहले
एक बार झाँक तो लो
हमारे अंतर्मन में…
वहाँ जाने कितनी परतों में
जमा हैं असुर—
ईर्ष्या, द्वेष, घृणा,
लोभ और अहंकार,
और दूसरों की पीड़ा तथा आँसुओं से
मुँह मोड़ लेने वाला
घना अंधकार।
माँ,
अपने त्रिशूल के प्रहार से
इन अदृश्य असुरों का भी
विनाश करो—
हे जगज्जननी!
मनुष्य आज
नक्षत्रों तक जा पहुँचा है,
विज्ञान ने असंभव की
सीमाएँ लाँघ ली हैं,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता
खोल रही है
संभावनाओं के अनगिन द्वार—
फिर भी
मनुष्य के भीतर
इतना घना अँधेरा क्यों?
धर्म के नाम पर द्वेष,
पहचान के नाम पर विभाजन,
विश्वास के नाम पर असहिष्णुता…
क्या इतने विद्यालय,
इतने महाविद्यालय,
इतने विश्वविद्यालय
खोलने के बाद भी
हम मनुष्य होना
नहीं सीख पाए?
इसलिए माँ,
दुर्गापूजा केवल
दीपों की जगमगाहट न हो,
मंडपों की सजावट,
उत्सव का उल्लास
और भीड़ का उन्माद न हो—
यह बने
अपने भीतर लौटने का
एक पवित्र अवसर।
प्रतिमा के सम्मुख
केवल हाथ न जुड़ें,
केवल पुष्प न चढ़ें—
हमारा अहंकार भी
तेरे चरणों में झुक जाए,
हमारे भीतर का अंधकार भी
तेरे प्रकाश में घुल जाए।
माँ, ऐसी शक्ति देना
कि हम निर्बल के साथ
चट्टान की तरह खड़े हो सकें,
असहाय की आँखों से
आँसू पोंछ सकें,
हाशिए पर खड़ा मनुष्य भी
सिर उठाकर जी सके।
हमें इतना प्रेम देना
कि जननी और जन्मभूमि
दोनों के प्रति
हमारा हृदय नतमस्तक रहे।
विश्व के हर घर में
शांति का दीप जले,
हर हृदय में
शुभबोध जागे,
मनुष्य और मनुष्य के बीच
फिर लौट आए
स्नेह, सद्भाव और सहानुभूति।
माँ,
तुम केवल असुर-वध करके
वापस मत लौट जाना—
हमारे भीतर भी
एक नया मनुष्य जगाकर जाना,
एक ऐसा मनुष्य
जो भीतर से प्रकाशित हो।
जो धर्म से पहले
मनुष्य को देखे,
पहचान से पहले
उसका हृदय पढ़े,
अपने सुख से पहले
दूसरे की आँखों का
एक आँसू देख सके।
माँ,
यही हो हमारी दुर्गापूजा,
यही हो हमारी अंजलि,
यही हो हमारा
आत्म-जागरण।
सभी अशुभ शक्तियों का
विनाश करो माँ,
और हमें दो वह शक्ति
कि अपने भीतर छिपे
असुर को पहचान सकें,
उसे परास्त कर सकें।
हमें दो
देश को आगे ले जाने का
अदम्य संकल्प,
ऐसा संकल्प
जिसके आगे
निराशा भी हार जाए।
माँ,
ऐसा संसार रचने की शक्ति दो
जहाँ विकास का अर्थ
केवल तकनीक की ऊँचाई न हो,
बल्कि मनुष्यता भी
उतनी ही ऊँची उठे।
अंतर्मन में आओ माँ,
और सदा जागती रहो—
हमारी सोच में,
हमारे कर्म में,
जनहित की हमारी प्रत्येक पहल में,
हमारी सृजनशीलता में।
इस युद्ध और हिंसा से
आहत संसार पर
अपनी करुणा बरसाओ।
मनुष्य को
सच्चा मनुष्य बनने का
आशीर्वाद दो—
हे त्रिनयनी माँ,
हे जगज्जननी,
अन्तर्मन में आओ माँ!
The Wake News Portal & Magazine