Tuesday , September 22 2026

‘एक मरीज की तमीज’ का साहित्यिक मूल्यांकन

‘एक मरीज की तमीज’ का साहित्यिक मूल्यांकन और सामाजिक चेतना

 

समीक्षक -डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी

वेद मेहता द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘एक मरीज की तमीज’ मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा, सामाजिक संवेदनहीनता और अंतरात्मा के दर्शन का एक अत्यंत भावुक तथा चिंतनशील दस्तावेज़ है। यह कृति एक ऐसे व्यक्ति के अंतर्मन की अभिव्यक्ति है जो गंभीर शारीरिक व्याधि (मांसपेशियों के रोग) से जूझते हुए समाज की विद्रूपताओं और कूटनीतिक रवैये को नज़दीक से देखता है। पुस्तक का मुख्य प्रतिपाद्य एक रोगी के दृष्टिकोण से उसके शारीरिक कष्ट और उसके प्रति समाज की उपेक्षा, शक तथा संवेदनहीनता को उजागर करना है। कवि दिखाता है कि जब शरीर काम करना बंद कर देता है और बीमार व्यक्ति असहाय हो जाता है, तब कूटनीति, चालाकी और आडंबर व्यर्थ लगने लगते हैं। रोग ने कवि के भीतर की दुनियादारी को पिघला दिया है और उसे सरल, शुद्ध एवं आत्मिक विचारों के करीब ला खड़ा किया है। ‘एक मरीज की ओर से’ कविता में कवि ने उन दोस्तों, रिश्तेदारों और समाज के ज्ञानियों पर करारा व्यंग्य किया है जो बीमारी को अहंकार, बहाना या निकम्मापन समझ लेते हैं और मरीज़ की वास्तविक पीड़ा को समझे बिना उसे बिन माँगी सलाह और ताने देते हैं। इसके साथ ही ‘क्यों दूर भागती है अच्छाई से ?’ में कवि दुनिया के प्रति निराशा और दुःख जताते हुए यह सवाल करता है कि समाज व्यक्ति को प्रेम, शांति और सहयोग सिखाने के बजाय नफ़रत, प्रतिस्पर्धा और चतुराई क्यों सिखाता है।

शिल्प और भाषा-शैली की दृष्टि से यह काव्य-संग्रह किसी शास्त्रीय नियम या जटिल छंद-विधान से बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह आधुनिक मुक्ताकाश की शैली में बहता है। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि हिंदी भाषा से उसका रिश्ता ‘मॉडर्न लव’ जैसा है—जहाँ शास्त्रीय ज्ञान से अधिक अनुभवों और भावनाओं की प्रधानता है। इसमें व्याकरणिक आघातों की परवाह किए बिना हृदय की वेदना को सीधे शब्दों में पिरोया गया है। रचनाओं में तत्सम, तद्भव और उर्दू शब्दों का प्राकृतिक समावेश है (जैसे: तमीज़, गुफ्तगू, कश्ती, कूटनीति, अंतःकरण, फ़ितरत), जो कविता को अत्यधिक संप्रेषणीय और मर्मस्पर्शी बनाता है। कविताओं का लहजा आत्मकथात्मक और संवादात्मक है, जहाँ व्यंग्य इतना तीखा और गहरा है कि पाठक समाज की वास्तविक निष्ठुरता को महसूस कर सकता है।

संग्रह की विभिन्न रचनाएँ जीवन के अलग-अलग दार्शनिक पहलुओं को उजागर करती हैं। शीर्षक कविता ‘एक मरीज की तमीज’ बीमारी से उपजी मानसिक स्वतंत्रता और सरलता को अपनाने के दर्शन को दर्शाती है, वहीं ‘मन की उड़ान’ असफलता और भीड़ के बीच भी मन को शांत व आशावादी बनाए रखने की आंतरिक शक्ति को रेखांकित करती है। ‘यही जिंदगी है’ ईश्वर के प्रति समर्पण और संघर्ष के बीच जीवन के आनंद को खोजती है, जबकि ‘पहला कदम’ छोटे-छोटे प्रयासों से बड़ी मुश्किलों को पार करने की प्रेरणा देती है। ‘असमर्थता’ में चिकित्सकीय बेबसी और अंतिम क्षणों की कड़वी सच्चाई का यथार्थवादी चित्रण है, तो वहीं ‘एक मरीज की ओर से’ मरीज़ की पीड़ा, परिजनों के संघर्ष और समाज के ‘संदेह रूपी रोग’ पर अंतिम करारा प्रहार करती है। अंततः, यह काव्य-संग्रह केवल एक बीमार व्यक्ति की आत्मकथात्मक वेदना नहीं है, बल्कि यह स्वस्थ समाज की मानसिक बीमारी का दर्पण है। कवि का यह संदेश कि शारीरिक रोग से बड़ा श्राप ‘शक की बीमारी’ है, पुस्तक को सर्वोच्च साहित्यिक एवं मानवीय ऊँचाई प्रदान करता है। यह सादगी, निर्भीकता और आत्म-साक्षात्कार का एक सुंदर प्रयास है जो पाठक को सहानुभूतिपूर्ण बोध और आत्म-चिंतन की ओर प्रेरित करता है।

 

About Shakun

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *